१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदेशद्रोही को बेचैनी हुई कि यदि मैं इस वैभव की गुलामी अपनी मां पर लाद दूं तो मुझे दो टुकड़े अधिक मिलेंगे। दो टुकड़े स्वयं को अधिक मिलें, इसलिए अपनी मातृभूमि को गुलाम बनाने को तैयार खड़े जंगबहादुर ने अपनी नेपाली सेना अंग्रेजों को सौंप दी। काठमांडू से तीन हजार गोरखा लोग अवध के पूर्वी भाग-आजमगढ़ और जौनपुर में अगस्त 1857 से आकर रूके हुए थे। उनसे लड़ने को विद्रोहियों का नेता गोरखापुर का मोहम्मद हुसैन तलवार लिये खड़ा था। इस समय दोआब की लड़ाई के कारण अंग्रेजी सेना की बड़ी खींचातानी हो गई थी और इस कारण बेणीमाधव, मोहम्मद हुसैन, रजा इरादत खान आदि योद्धाओं ने बनारस के आसपास का, अवध के पूर्व की ओर का प्रांत पूरी तरह कब्जे में ले लिया था। उस प्रांत में अंग्रेजी सेना के अन्य स्थानों से खाली होने के पहले ही नेपाली सेना ने बड़ी वीरता से विद्रोहियों को अवध की ओर धकेल दिया था। कुछ दिन बाद जंगबहादुर से अंग्रेज सरकार का निश्चित करार हो गया और उस प्रदेश में तीन सेनाएं तैयार की गईं। 23 दिसंबर को स्वयं जंगबहादुर नेपाल से चलकर अंगेजों से आ मिला। कुल मिलाकर नौ हजार गोरखा लोगों की चुनी हुई सेना उसके साथ थी। उस सेना ने अंग्रेजों के फ्रैंक रोक्राफ्ट की सेना के साथ बनारस के उत्तर और अवध के पूर्व का सारा प्रांत जीतने में सफलता प्राप्त की। अंग्रेजों और गोरखों की यह सबल और संगठित सेना लड़ाई के बाद लड़ाई कर उस प्रांत के विद्रोहियों को पीछे-पीछे हटाती हुई फरवरी की 25 फरवरी को अवध में आ घुसी। घाघरा नदी पार कर अंबरपुर में यह अंग्रेजी और नेपाली सेना आ पहुंची। उस रास्ते में एक मजबूत किला ऐसे महत्त्वपूर्ण स्थान पर घड़ी झाड़ियों में खड़ा था कि उसे विद्रोहियों से जीते बिना अंग्रेजी सेना आगे जा ही नहीं सकती थी। इसलिए नेपाली सेना ने उसपर आक्रमण किया। किला लड़ने लगा। उस सर्वांगपूर्ण सेना वे वह किला लड़ने लगा और उस किले को इस तरह लड़ानेवाले क्रांतिवीरों की संख्या कितनी थी। चौंतीस! चौंतीस लोग स्वतंत्रता की स्फूर्ति में मस्त होकर अपने देश के शत्रुओं से वह किला लड़ा रहे थे। नेपाली सेना ने जबरदस्त आक्रमण किया तो उन चौंतीस देशवीरों ने उसका जबरदस्त सामना किया। क्योंकि चौंतीस लोग शत्रु के हजारों सैनिकों से युद्ध करें-ऐसा दिव्य समर इस जड़ पृथ्वी पर किसी भी काल में होना नहीं है। “उन चौंतीसों ने देश की इज्जत और धर्म की रक्षा के लिए वह किला ऐसी वीरता से लड़ाया कि शत्रु के सात योद्धा मारे गए तब भी वह किला लड़ता रहा। और ज बवह चौंतीसवां अपने स्थान से न हटकर धारातीर्थ में गिर गया तब ही वे शत्रु उस किले में जा सके।"140 जैसी दिल्ली 1857 का स्वातंत्र्य समर – 322
140 मैलसन कृत- 'इंडियन म्युटिनी', खंड 4 पृष्ठ 227 ।