१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनहीं लड़ी, जैसा लखनऊ नहीं लड़ा, ऐसा वह अंबरपुर का किला लड़ा। अंबरपुर का किला जीतने के बाद गोरखों और अंग्रेजों की संयुक्त सेना वहां के प्रदेश जीतते हुए आगे बढ़ी। उसी के पीछे-पीछे जनरल फ्रैंक भी सुलतानपुर के नाजिम मेहंदी हुसैन और उनके कमांडर बंदा हुसैन से बदायूं और सुलतानपुर आदि स्थानों पर लड़ाइयां लड़ता ऊपर चढ़ रहा था। अवध के पूर्वी भाग के इस प्रदेश में विद्रोहियों ने आज तक जो शासन संभाला था उसे उपर्युक्त जनरल फ्रैंक द्वारा हथिया लेने पर उसे फिर से प्राप्त करने लखनऊ की पूर्व रियासत के तोपखाने के प्रसिद्ध अधिकारी मिर्जा गफूर बेग को लखनऊ दरबार ने भेजा। उसकी सेना के सुलतानपुर की जंगी लड़ाई में 23 फरवरी को पराजित हो जाने के बाद जनरल फ्रैंक पूरी तरह सफल हो गया। पर सर कोलिन से मिलने के पूर्व देदार के किले पर उसने घेरा डाला। उस किले के वीर लोगों द्वारा तोपें छिन जाने के बाद भी शत्रु से लड़ाई जारी रखने से अंग्रेजी सेना को लेकर फ्रैंक को पीछे हटना पड़ा। वास्तव में देखा जाए तो फ्रैंक ने इतनी लड़ाइयां जीती थी कि एक आकस्मिक और छोटी पराजय से उसकी कुछ भी हानि होनेवाली नहीं थी। फिर भी उस समय अंग्रेजी अनुशासन और जवाबदेही इतनी कड़ी थी कि फ्रैंक की अनेक जीतों के बाद भी उसकी एक हार का समाचार मिलते ही सर कोलिन ने महत्वपूर्ण पदोन्नति के लिए लिखा उसका नाम काट दिया। इस तरह लखनऊ शहर पर आक्रमण करने को बढ़ रही अलग-अलग सेनाएं एक-दूसरे के एकदम पास आने लगीं। कानपुर से निकली सर कोलिन की प्रचंड सेना उधर पश्चित से बढ़ रही थी तो फ्रैंक और जंगबहादुर की सेना पूर्व की ओर से ऊपर चढ़ रही थी। 11 मार्च के पहले ये सारी सेनाएं इकट्ठा हो गई और उस पापी शहर की गरदन काटने के लिए उनकी तलवारें उतावली हो गई थी। पापी! नहीं! नहीं! केवल अभागा लखनऊ-उसके गले पर ये अपनों और परायों की तलवारें सपासप चलने को उतावली हैं तो फिर उसके प्रतिकार के लिए भी कुछ व्यवस्था हो रही है या नहीं? कानपुर की ओर तात्या क्या गड़बड़ कर रहा है, यह देखने सर कोलिन जब पिछले नवंबर में गया था तब से इस मार्च तक इस लखनऊ की सुरक्षा और उसके शत्रु के विनाश के लिए उसके निरंतर प्रयास चल रहे थे। आज तक कितनी ही बार कानपुर में नाना साहब की बार-बार हार और अखंड समर ने उसका अप्रत्यक्ष संरक्षण किया था। अंग्रेजी सेना लखनऊ की ओर बदला लेने के लिए गंगा पार होने लगती कि नाना कानपुर की ओर उसपर दबाव बनाकर उसे फिर दोआब में खींच लेते। ऐसा उत्तम पेंच नाना ने डाला था, फिर भी लखनऊ उसका वैसा लाभ नहीं ले पाया जैसा लेना चाहिए था। लखनऊ में शान से लहराते स्वतंत्रता के झंडे की रक्षा के लिए राजा से रंक तक हर कोई हथेली पर जान लिये लड़ रहा था। उसमें कितने ही जमींदार और राजा भी थे। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 323