भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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करने लगती है। विदेशी शासन का निःपात करने निकले वीर अंत में शासन का ही नाश करने लगते हैं। विदेशी राज्य के बंधन काट देने के रण-मद में उन्हें राजबंधन ही अस्वीकार हो जाते हैं और इस तरह राज्य क्रांति का अंत अराजकता में, सद्गुणों का अंत दुर्गुणों में हो जाता है और हितकर प्रयासों के परिणाम अहितकारी होने लगते हैं। अराजकता-पराजय जितनी ही बंधन-रहितता दुष्ट बंधनों जैसी ही व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के नाश का कारण होनेवाली होती है-इस समाज-सत्य का विस्मरण जिस किसी क्रांति में हुआ उस क्रांति का उसके क्रांति तत्त्व कारण ही विनाश हुआ है। किसी रोग का परिहार करने के लिए मद्य सेवन की आदत जैसे जाती नहीं, वैसे ही दुष्टतापूर्ण बंधन से मुक्ति के लिए पिया जानेवाला बंधनोच्छेद का मद्य दुष्टता चली जाने के बाद भी व्यसनी लोगों को अंधाधुंध और बेसुध किए रहती है। जो राज्य क्रांति अपवित्र होने लगती है और अपवित्रता के सहभागी विनाश के बीज उसका जल्द ही प्राण हरण कर रहे हैं। इसलिए परतंत्रता के रोग का नाश करने के लिए जिन्हें राज्य क्रांति का मद्य पीना है उन्हें उस मद्य का व्यसन न लग जाए-वे ऐसी दक्षता हमेशा रखें। विदेशी सत्ता को धिक्कारते हुए ही स्वकीय सत्ता का सम्मान करने की दृढ़ शिक्षा देते जाएं, दुष्टापूर्ण बंधन का उच्छेद करते हुए निरकुंशता का चस्का न लगे, ऐसी सजगता रखें। परराज्य का एवं परनिर्मित अधिकार का निःपात करते समय स्वराज्य एवं स्वनिर्मित अधिकार को अति पूजनीय-वंदनीय मानते जाएं। पर सत्ता का उच्छेद होते ही स्वदेशीय समाज में अराजकता के नाशकारी प्रभाव न पड़ें, इसिलए तत्काल बहुमत से जो राज्य-घटना निर्माण हो उसे सब लोग वंदनीय मानें। उस राज्य-घटना की ओर से जो अधिकारी नियुक्त हो उसे सब लोग वंदनीय मानें। उस राज्य-घटना की ओर से जो अधिकारी नियुक्त किए जाएं उनके आदेशों को सिर नवाकर मानना चाहिए, उनके आदर्शों के अनुसार व्यवहार करना चाहिए। व्यक्ति की झक भूलकर समष्टि कि सिद्धांत से तन्मय रहना चाहिए और इस बहुमत से निर्मित स्वराज्य घटना में यदि कुछ परिवर्तन करना अपनी विवके बुद्धि को न्यायपूर्ण लगता हो तो उसे बहुमत नियम के अनुसार वैध मार्ग से ही घटित किया जाना चाहिए। सारांश यह कि बाहर विदेशियों का तख्ता पलटना, परंतु अंदर निर्माण करना; बाहर तलवार, पर अंदर विधि-कानून राज्य क्रांति की सफलता और सिद्धि के लिए अति आवश्यक राज्य व्यवस्था के उपर्युक्त सिद्धांत का सन् 1857 के पूर्वार्ध में बहुत अच्छी तरह पालन किया गया। विद्रोह होते ही यथासंभव वेग से दिल्ली, लखनऊ, कानपुर आदि शहरों में व्यवस्था से राजय प्रबंध के कर्तव्य करने की ओर ध्यान दिया गया। व्यक्ति विषयक अन्याय के अपहरण की इच्छा से इन सब प्रमुख शहरों में कोई भी नकली व्यक्ति अंतिम क्षण तक 1857 का स्वातंत्र्य समर – 286

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