१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंओनेवाला नहीं था; क्योंकि अब उसने अपनी सेना की उत्तम एकबद्धता कर मार्ग की सारी बाधाएं दूर कर ली थीं और इसलिए दिनोंदिन अंग्रेजी कमांडर-इन-चीफ के तंबू पर प्रत्यक्ष गोलाबारी का गुल्ली-डंडा खेलते बैठे दृढ़, साहसी और उद्दाम विद्रोहियों से 6 तारीख को स्वयं आगे बढ़कर युद्ध करने का निश्चय उसने किया। इस समय विद्रोहियों की ओर कोई आठ-दस हजार सैनिक शिक्षा प्राप्त सिपाही थे और उनके बाएं बाजू में सवयं नाना साहब, दाईं ओर ग्वालियर की सेना और उस सब पर तात्या टोपे सेनापति थे। अंग्रेजों के पास कुल गोरी और काली मिलाकर पांच हजार पैदल, छह सौ घुड़सवार, पैंतीस तोपें-ऐसे लगभग छह हजार लोगों की सेना सज्ज थी। चार्ल्स बॉल कहता है-'पचहत्तर हजार सेना थी और उन सब पर स्वयं कमांडर-इन-चीफ सर कोलिन सेनापति था।'' ऐसी इन तत्त्वनिष्ठा को कर्तव्य का बल देनेवाला कोई कर्णधार विद्रोहियों की ओर आने की बजाय अंग्रेजी छावनी में ही निकल्सन के आने से वह लाभ मिलने पर दिल्ली में निराश की छाया पड़ने लगी। नीमच और बरेली की सेना एक-दूसरे के सिर निराशा का खपरा फोड़ने लगी और वेतन मिलने के बाद भी बदमाश सिपाही फिर-फिर निराशा का खपरा फोड़ने लगी और वेतन मिलने के बाद भी बदमाश सिपाही फिर-फिर वेतन का तगादा क रवह न मिलने पर शहर के श्रीमान लोगों पर अत्याचार करने की धौंस देने लगे। तब बख्तर खान ने बादशाह की इ च्छा से सारे नेता, सारी सेना एवं चुने हुए नागरिकों को बुलाकर प्रश्न किया-'लड़ाई चालू रखनी है या बंद करनी है?'' आकाश फट जाए, इतने जोर की गर्जना कर सबने उत्तर दिया-'लड़ाई, लड़ाई, लड़ाई!'' दिल्ली का यह अटल निश्चय देखकर फिर से सब ओर जोश दिखा और बरेली और नीमच की सेना को साथ लेकर अंग्रेजों के सीजट्रेन पर हमला करने के लिए विद्रोहियों की सेना नजफगढ़ तक पहुंची। बरेली ब्रिगेड ने जहां डेरा डाला, नीमच की सेना वहां डेरा न डालकर शत्रु पर एक साथ आक्रमण न करते हुए और बख्तर खान का आदेश न मानते हुए पास के एक गांव में जाकर उतरी। अंग्रेजों को यह समाचार मिलते ही उनका ताजादम सेनापति निकल्सन चुनी हुई एवं भरपूर सेना के साथ बहुत तेजी से नजफगढ़ की ओर चल पड़ा और बख्तर खान का आदेश न मानकर एक तरफ पड़ाव डाले हुई नीमच ब्रिगेड पर उसने अकस्मात् छापा मारा। विद्रोही असावधान, अकेले और अव्यवस्थित थे तो आक्रमणकर्ता सावधान, सनायक, व्यवस्थित-निकल्सन के सेनापतित्व में। फिर क्रांतिकारियों की दुर्दशा की सीमा शेष नहीं रही। बेश कवे लड़े बड़ी बहादुरी से, शत्रु भी स्तुति करें-इतनी शूरता से लड़े। पर वह शूरता निष्फल। बुंदेल की सराय की लड़ाई के बाद विद्रोहियों की ऐसी पराजय नहीं हुई थी। नीमच की पूरी ब्रिगेड उस दिन नष्ट हो गई। स्वयं के द्वारा जिसे अधिकार सौंप गए थे उसके आदेश का पालन न करके अहंभाव के किए गए आचरण का ऐसा फल मिला। बिना आदेश के शूरता भी वीरता के अभाव 1857 का स्वातंत्र्य समर – 276