भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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जैसी ही निष्फल रहती है। 25 अगस्त को मिली इस विजय से अंग्रेजी छावनी में आज तक छाए निराशा के बाद बिल्कुल छंट गए। जून माह से यही सच्ची विजय उनको मिली थी। अब हर कोई दिल्ली पर हमला करने को व्याकुल हो गया। कमांडर विल्सन ने बेअर्ड स्मिथ को अंतिम आक्रमण का नक्शा तैयार करने का आदेश दिया। जिस बेअर्ड ने निराशा से भरे अंग्रेजों को दिल्ली से वापस लौटने से रोका था उसी ने वह नक्शा भी तैयार किया। पंजाब से आनेवाली सीजट्रेन आक्रमण के लिए आवश्यक अप्रतिम युद्ध सामग्री लेकर अंग्रेजी छावनी में सुरक्षित पहुंच गई। जिस शहर ने अंग्रेजों की उत्कृष्ट सेना को, सेनापतित्व को और समरपटुत्व को तीन माह तक रणांगण में परेशान किया हुआ था उस दिल्ली को धूल में मिलाकर आज तक सहे कष्ट को सफलता में बदलने का समय निश्चित ही पास आया हुआ है-ऐसा उत्साहवर्धक संदेश भी अंग्रेजी सेना के कमांडर ने लश्कर में प्रचारित किया। पंजाब की नई सहायता आने के बाद अंग्रेजों की कुल साढ़े तीन हजार यूरोपियन, पंच हजार नेटिव सिख, पंजाबी आदि सिपाही और ढाई हजार कश्मीरी सेना मिलकर कोई ग्यारह हजार लोगों के अतिरिक्त अपने सैकड़ों सिपाही लेकर स्वयं जींद रियासत का राजा दिल्ली विजय के मुहूर्त पर अंग्रेजों से आकर मिल गया था। सितंबर के पूर्वार्ध में अंग्रेजी कमांडर ने विघातक पद्धति से आक्रमण कर नई-नई बैटरियों का निर्माण प्रारंभ किया है, यह देखकर दिल्ली के विद्रोहियों में भय निर्माण हुआ और चारदीवारी के बाहर अंग्रेज मानो एक व्यक्ति हो, ऐसे अनुशासनबद्ध होकर बढ़ते जाते थे। जबकि चारदीवारी के अंदर अवज्ञा और अनुशासनहीन व्यवहार वृद्धि पा रहा था। अंग्रेजों की ओर जो नेटिव थे वे तोपों की मार में बैटरी निर्माण के कार्य में इतनी दृढ़ता से लगे रहते कि फॉरेस्ट लिखता है-“नेटिव लोगों में कूट-कूटकर समाए निश्चलता के शौर्य का उन्होंने कमाल दिखाया। एक के बाद एक आदमी मरता जा रहा था-मृतक के लिए एक क्षण वे ठहरते, एक-दो आंसू बहाते, शवों की पंक्ति में वह शव रखते और फिर से उस मृत्यु स्थान पर काम करने लगते।" अंग्रेजों के अधीन नेटिव ऐसा अचल अनुशासन बरतते और दिल्ली शहर के नेटिव एक-दूसरे का काम ढकेल रहे थे। इस भिन्नता से बहुत सीखना आवश्यक है। अधिकारियों का उचित सम्मान और आदेश के शब्दों के प्रति आदर, यह अनुशासन का मुख्य बीज है। पर दिल्ली में इस बीज को सब जगह पैरों के नीचे कुचला जा रहा था। अधिकतर दोष असमर्थ अधिकारियों को और शेष स्वच्छंद आचरण करते अनुयायियों को; और अब उनमें निराशा, निरुत्साह का जोर! दिल्ली के बाहर बढ़ता जा रहा दबाव और दिल्ली के अंदर अस्त होता जा रहा यह उत्साह-इन दोनों का ही अंत करने के लिए सितंबर की 14 तारीख उदय हुई। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 277