भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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अंग्रेजी सेना के चार विभाग कर उसमें से पहले तीन विभाग निकल्सन के अधीन कश्मीरी दरवाजे से घुसने के लिए भेजे गए और काबुल दरवाजे से घुसने के लिए चौथा भाग मेजर रीड के अधीन अंग्रेजों की दाईं ओर खड़ा हो गया। इन दो स्थानों पर चारदीवारी में छेद करने का काम प्रारंभ हुआ। सूर्योदय होते ही अंग्रेजों की दीवार फोड़नेवाली तोपें एकदम बंद हो गई। अंग्रेजों के शिविर में एक क्षण भर अंतिम समय की निःशब्दता! और तुरंत ही निकल्सन के साथ वह शिविर किसी जीवित दीवार की तरह एकाएक आगे दौड़ चला। उसके पहले नंबर के कॉलम ने कश्मीर बेस्टन के पास दीवार में जो छेद बनाया था उधर हमला किया। इसमें से गोलियों की बौछार शुरू हो गई। खंदक में अंग्रेजों के शव धड़ाधड़ गिरते हुए कुछ दीवार से आ लगे। दीवार को सीढ़ी लगी। सीढ़ी पर चढ़ा कि गिरा-ऐसी प्रचंड मार में अंग्रेजी सेना फिर-फिर दीवार पर चढ़ने लगी। अंग्रेजी सेना दीवार के छेद से अंदर घुसी। दीवार का वह हिससा जीत लिया गया-विजय का घंटा बजा। इस कश्मीर बेस्टन जैसे ही वॉटर बेस्टन के छेद से भी भयानक मारकाट करते, मरते-मरते एवं मारते-मारते अंग्रेजों के दूसरे नंबर के कॉलम ने वह छेद जीत दीवार के अंदर प्रवेश किया। तीसरे नंबर का कॉलम कश्मीरी दरवाजे की ओर जा रहा था। लेफ्टिनेंट होम और सालकेल्ड के वह दरवाजा बारूद लगाकर उड़ा देने के लिए उस दरवाजे के सामने आते ही दीवार के सामने खंदक पर बना पुल गिराया हुआ था। केवल एक बल्ली बची हुई दिख रही है। ठीक है, उसी पर से चलो। सार्जेंट मरा। वह महादूत भी गिरा पर आगे बढ़ो, होम आगे चला। होम ने आगे जाकर हाथ का बारूद अंत मं दरवाजे में रख ही दिया। तो फिर आग लगानेवाली दूसरी टोली बल्ली पर से घुसने लगी। लेफ्टिनेंट सालकेल्ड गोली लगकर गिर पड़ा, कारपोरल तू आगे घुस-तुझे भी गोली लगी? पर कुछ परवाह नहीं। मरते-मरते शूरों ने चिंगारी तो डाल ही दी। धड़ाड़, धड़ाड़, धड़ाड़? कश्मीरी दरवाजा खुलने की राह देखते अंग्रेजी सेनापति को उस भयानक युद्ध की मारा-मारी के घन गर्जन में वह आवाज साफ सुनाई नहीं पड़ा। परंतु वे आगे बढ़े? पर क्यों न बढ़े? यद्यपि विजय का घंटा मुझे सुनाई नहीं दी। फिर वह आगे बढ़े अंग्रेजी वीर! वे असफल हुए होंगे, यह असंभव! अब बहुत समय हो गया है, अतः हम आगे तो बढ़ ही लें। ऐसे प्रबल आत्मविश्वास से कैंपबेल ने हमले के आदेश दिए। खंदक तक वे पहुंचे। उन्होंने खंदक में पड़े अपने विजयी मरणोन्मुखों को देखा और मारते-दौड़ते वे कश्मीरी दरवाजे के टूटे हिस्से से दिल्ली में कूद पड़े। वहीं उन्हें अपने-अपने काम सफलता से पूरे कर दिल्ली में घुसे हुए वे पहले दो कॉलम भी मिले। निकल्सन के अधीनस्थ ये तीनों 1857 का स्वातंत्र्य समर - 278