भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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भेज दी थी। इस सेना के आने का समाचार अंग्रेजी छावनी में फैलते ही सैनिकों की मुद्रा में आनंद, उत्साह और द्वेष का तेज झलकने लगा। उस तेज में दो हजार सैनिक आने का हिस्सा उतना नहीं था, उस निकल्सन के आने से वह तेज विशेष झलकने लगा था। निकल्सन जैसे एक नेता का अर्थ हजारों सैनिकों का उत्साह था। हतोत्साहित अंग्रेजी सेना का हर जवान कहने लगा, "निकल्सन आया है, अब विजय में शंका नहीं!'' सुयोग्य कर्णधार मिल जाने से अंग्रेजी सेना के लिए विजय जितनी आशंकारहित होती गई उतनी ही दिल्ली के लिए पराजय सुनिश्चित होती गई; क्योंकि उनकी मुख्य कमी सुयोग्य कर्णधार की ही थी। विद्रोहियों ने जिसे नव सिंहासन पर बैठाया था। वह बादशाह शांतिकाल में दयाशीलता में कितना ही चरित्रवान् हो, परंतु युद्धकाल में अत्यावश्यक रणपटुता और नेतृत्व में असमर्थ और पूरी तरह अनभ्यस्त था। रणपटु सेना को भी लज्जित किया था। अंग्रेजों की अधीनता में ही जिनके शस्त्राभ्यास और अनुशासन की शिक्षा पूरी हुई थी, जिन्होंने तलवार से ही अंग्रेजों के लिए अफगानिस्तान तक साम्राज्य की सीमा बढ़ाई थी, ऐसे कोई पचास हजार सिपाही उस दिल्ली की चारदीवारी के अंदर से उन अभिमानी अंग्रेजों को एक जगह बांधकर आज तक चिढ़ा रहे थे। परंतु उन पचास हजार सिरों को एकीकृत करनेवाला एक सिर फिर भी दिल्ली को चाहिए था। इन इतने भिन्न-भिन्न मणियों की स्वतंत्रता की उत्सुकता एक धागे में पिरोई गई थी। परंतु अंतिम सूत्रमणि का बंधन न मिलने से यह बंधरहित माला एक झटके में आब तक छितर नहीं गई यही एक आश्चर्य था। स्वतंत्रता की हवा से ये रेत कण एक बादल में मिल गए थे, पर हवा से उत्पन्न बादल जैसा ही बिखराव उनमें बना हुआ था। ऐसी स्थिति में उन्हें एक कर्णधार चाहिए था। उन्होंने जिसे मुखिया माना था वह वृद्ध बादशाह भी किसी एक कर्णधार के लिए उन हजारों सिपाहियों जितना ही उतावला था। उसने बख्तर खान को सारे अधिकार देकर देखे। फिर उसने तीन जनरल नियुक्त कर उनके हाथों में नेतत्व देकर देखा। फिर दिल्ली के तीन नागरिक और सिपाहियों के तीन प्रतिनिधि ऐसे छह लोगों का प्रतिनिधिमंडल सारी कार्यवाही संगठित रीति और एकमत से करे, यह निश्चित किया। पर वह प्रतिनिधिमंडल भी जब निष्फल हो गया तब उस उदार और देशाभिमानी बादशाह ने अपने कारण यदि राज्य क्रांति का नाश हो रहा हो और अपने कारण कर्ता लोग अंग्रेजों की ओर जा रहे हों तो अपना शासन भी छोड़ देने को मैं तैयार हूं, इसकी घोषणा की। हिंदुस्थान अंग्रेजों के अधीन रहने की अपेक्षा, हिंदुस्थान में विदेशियों का भ्रमण चालू रहने की अपेक्षा तथा हिंदुस्थान किसी तरह की राजनीतिक गुलामी में सड़ते रहने की अपेक्षा, स्वदेश को स्वतंत्रता प्राप्त करा देनेवाला कोई भी स्वदेशी अधिपति आगे आए तो मुझे सौ गुना अधिक आनंद होगा, ऐसा उस वृद्ध मुगल ने सबको सूचित किया और अपने हस्ताक्षरों से जयपुर, अलवर, जोधपुर, बीकानेर आदि प्रमुख राज्यें को पत्र लिखे 1857 का स्वातंत्र्य समर – 274

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