१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसेना को नेस्तनाबूद कर कुंवर सिंह के सिपाही जो वापस लौटे तो आयर की सेना के उधर आने का समाचार उस वृद्ध सेनानी को मिला। क्षण भर का भी विश्राम न लेकर उसने अपनी सेना इकट्ठी की। मेजर आयर जिधर से आ रहा था उस रास्ते के हर अवरोध का लाभ लेते हुए उसने लड़ाई जारी रखी और अंत में 2 अगस्त को बीबीगंज गांव के पास लड़ाई की टक्कर ली। सामने की एक झाड़ी की ओर ये दोनों उसे अपने कब्जे में लेने के लिए दौड़ रही थीं। उस वृद्ध और युवा की भयंकर स्पर्धा में वृद्ध कुंवर सिंह ही उस झाड़ी पर पहले कब्जा करने में सफल रहा। और वहां आते ही उसने आयर पर जोरदार मार चालू की। आयर के पास तीन उत्तम तोपें और उनके सहारे से वह आगे बढ़ रहा था। कुंवर सिंह के सिपाही उसपर तीन बार टूटे। तीनों ही बार उन अग्निवर्षा तोपों के मुंह तक उनके हल्ले पहुंचे, पर अंग्रेज तोपों की मार अखंड चलती रही। इसी समय कैप्टन हेस्टिंग नामक अंग्रेजी योद्धा आयर के पास हांफते हुए आया है।‘‘ यह उग्र स्थिति और आधा घंटा बनी रहती तो कुंवर सिंह वह लड़ाई जीत जाता। अब कुद भी करें तो भी विजय हाथ से जा रही है तो क्यों न एक बार साहस की परीक्षा कर ली जाए। तुरंत अंग्रेजी सेना बैनेट साधकर विद्रोहियों पर तीर की तरह टूट पड़ी। तोपों में मुंह पर भी जो सिपाही टूटने में डगमगाते नहीं थे वे विद्रोही सिपाही अंग्रेजों के बैनेट के हमले के आगे खड़े रहने का जाने क्यों कभी साहस नहीं करते थे और यहां भी वे हिम्मत हार गए। आयर उन्हें उस झाड़ी में से बाहर निकाल आगे घुसा और आरा की गढ़ी की ओर बढ़ गया। वहां बंद अंग्रेजी सेना को उसने मुक्त किया और इस तरह आरा शहर फिर से अंग्रेजों के हाथ आ गया। आरा शहर का घेरा कोई आठ दि नही चला था। उन आठ दिनों में यह घेरा संभालते जगदीशपुर के उस शूर पररावार नहीं था तब भी उसके बाजारू अनुयायियों में जोड़-तोड़ और साहस की कमी के कारण आयर से पराजित होते ही कुंवर सिंह जगदीशपुर की ओर निकल गया। अंग्रेजी को आरा की सेना और अन्य नई कुमुक मिलने से वह सेना फूलती जा रही है, यह ज्ञात होने पर कुंवर सिंह ने जगदीशपुर के पास यथासंभव लोगों को इकट्ठा करना चालू किया। अंग्रेजी सेना को कुंवर सिंह के कर्तव्य की थोड़ी सी पहचान हो जाने से कदाचित् वह फिर से आरा के घेरा टूट जाने पर जिनका उत्साह भंग हुआ है ऐसे अनुयायियों के साथ अंग्रेजों जैसे अनुशासित, एक दिलवाले और विजय से सबल हुए शत्रु से राजधानी के एक शहर के पास खुली लड़ाई लड़कर सारी हानि न 1857 का स्वातंत्र्य समर – 270