१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअंग्रेजों की वरदी सफेद रंग की होने से वह कुंवर सिंह को दिखाई देती थी। परंतु कुंवर सिंह के लोग काले, उनकी वरदी काली और रात काली और रात काली! सारे काले वस्त्रों के एक दिल हो जाने से सिखों के काले-दोनों पैर रणक्षेत्र से भाग खड़े हुए। उनका कमांडर डनबार पहले झटके में ही मारा गया था। अपने प्राण बचा भागते वह अंग्रेजी सेना एक गांव में आ पड़ी। वहां कुछ देर छिपकर बैठने का प्रयास कर भोर होते ही उस घनघोर रात में रणक्षेत्र में मरे हुए ही नहीं, अपने घायल बंधुओं को वहीं छोड़ऋ अपने कमांडर का शव भी वैसे ही छोड़कर वे भूखे, प्यासे, रक्तरंजित, शर्म से काले पड़े अंग्रेज सैनिक प्राण की आशा में शोण नदी की ओर दौड़ने लगे। परंतु कुंवर सिंह के आगे दौड़ना भी कोई साधारण बात नहीं थी। हर कदम पर उनका रक्त टपकता। कोई जंगली सूअर शिकारी का भाला घोंपे जाने शरीर से रक्त की अविरल धार बहाते, शक्ति क्षय से बार-बार इधर-उधर गिरते, किसी पिघले मेघ जैसा लाला शोणित बिखेरता दौड़ता जाए-वैसे ही अंग्रेजी सेना शोण नदी तक दौड़ती आई। पर यहां तो विनाश की पराकाष्ठा हो गई। नौकाएं न मिलीं, जो मिलीं, जो मिलीं वे रेत में धंस गईं, जो रेत में नहीं धंसी उन्हें पांडे लोगों ने जला दिया । एक-दो नौकाएं शेष रहीं। आरा का घेरा तोड़कर वहां के बहादुर लोगों सहित विजय गीत गाती अपनी सेना लौटी होगी, इसलिए दानापुर के अंग्रेज नर-नारी नदी किनारे पहुंचे तो उन्हें नौकाओं से एक भी उत्तेजक हंसी सुनाई नहीं दी। झंडा नहीं, बैंड नहीं, कोई ऊपर सिर उठाए नहीं, सबका सीना धड़धड़ाने लगा। मेरा पुत्र, मेरा भाई, मेरा बाप, मेरा पति-कल ही आकर हंसते-मुस्कुराते लड़ाई पर गया और आज हे भगवान! कृपा कर, अमंगल टाल। यह निवेदन परमेश्वर के घर पहुंचने के पहले ही अपयश लिये वह अंग्रेज सेना दानापुर के घाट पर आकर लगी। और तुरंत ही वह भयानक समाचार इधर-उधर फैला कि चार सौ पंद्रह में से कोई पचास लोग ही कुंवर सिंह की मार से बचकर जीवित लौटे हैं। एक अंग्रेज लेखक लिखता है-‘उस समय का महिलाओं द्वारा किया गया विलाप जिसने सुना होगा वह उसे आजीवन भूल नहीं सकता। कुछ स्त्रियां कर्कश ध्वनि से चीखने लगीं, कुछ फूट-फूटकर रोने और अपने बाल नोचने लगीं। उनके उस शोक आवेग में उन्हें जनरल लॉयड दिखाई दे जाता तो इस नाश के मूल उत्पादक को वे जीवित फाड़ डालतीं-इसमें शंका नहीं थी।’ परंतु इन अंग्रेज महिलाओं के रूद्रन स्वर से दानापुर का आकाश जब इधर फट रहा था तब उनके दुःखों का बदला लेने के लिए मेजर आयर उधर आरा की ओर जा रहा था। उसे उपर्युक्त पराजय का समाचार अभी मिला नहीं था, फिर भी आरा में अंग्रेजी सेना घिरी हुई है, यह सुनते ही वह उधर दौड़ पड़ा। 29 और 30 जुलाई को डनबार की 1857 का स्वातंत्र्य समर – 269