भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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आप बहुत वृद्ध हैं, आपका स्वास्थ्य भी ठीक नहीं है, अतः आपके शेष जीवन का सान्निध्य लाभ मुझे मिल सके, ऐसी मेरी प्रबल इच्छा होने से आप पटना में मेरे मेहमान रहें तो मैं आपका आभारी हूंगा। यह आमंत्रण अस्वीकृत नहीं होगा ऐसी आशा करता हूं-टेलर, अफजल खां ने शिवाजी को ऐसे ही मिलने का निमंत्रण दिया था। उस चतुर राजपूत ने तब ही जाना कि पटना के चीफ कमिश्नर का यह प्रेम निमंत्रण माने कैदखाने का दरवाजा किसी भी प्रतिकार के बिना खोल देना था। इसलिए उसने भी उत्तर भेजा-''आभारी हूं। मेरा स्वास्थ्य आप लिखते हैं वैसे-मैं सचमुच बहुत अस्वस्थ हूं और इसीलिए अभी पटना नहीं आ सकता। मैं स्वस्थ होते ही तुरंत वहां आता हूं।'' कुंवर सिंह! 'अस्वस्थता' सुधारने को जो औषधि चाहिए थी वही लेकर दानापुर के विद्रोही सिपाही जगदीशपुर आ पहुंचे फिर अब इहरना किसके लिए? तेरी देशमाता की शपथ है, तेरे स्वधर्म की शपथ है, तेरे मानभंग की शपथ है, कुंवर सिंह म्यान फेंक दे और स्वतंत्रता के लिए तलवार खींच! तू हमारा राजा, तू हमारा नेता, तू हमारा सेनानी है। राजपूत वंश के शिरभूषण, तेरी यह उदात्त चरित्र देह! 'यह शय्या पर नहीं, रणभूमि पर ही गिरने के योग्य है।' स्वराज्य के लिए उतावले वे सैनिक चिल्लाने लगे-यही कुंवर सिंह के कुलोपाध्याय शुचिव्रत ब्राह्मण उपदेश करने लगे।¹²⁴ ऐसा ही उसकी तैयार तलवार भी कहने लगी। पटना शहर हाथी पर बैठकर जाना भी जिसे अस्वस्थता के कारण असंभव, वह अस्सी वर्ष का राजपूत कुंवर सिंह तड़ाक से उठा और रुग्ण शय्या पर से वह जो उठा तो एकदम रणक्षेत्र में ही जाकर रूका। शाहाबाद जिले के मुख्यालय 'आरा' शहर में जगदीशपुर से निकले सिपाही दौड़ते गए और उन्होंने वहां का अंग्रेजी खजाना, झंडा, कारावास, कार्यालय सबमें उत्पात किया और एक छोटे से परकोटे की ओर मुंह मोड़ा। विद्रोह हो जाए तो स्व संरक्षण कर सकें इसक लिए उस शहर के धूर्त अंग्रेजों ने उस परकोटे में गोला-बारूद्ध, अस्त्र, अन्न, वस्त्र आदि सामग्री रखी हुई थी। केवल उस शहर के मुट्ठी भर अंग्रेजों को सहायता देने के लिए पटना से पचास सिखों की एक टुकड़ी भी आई हुई थी। ऐसी तैयारी से सिखों सहित पचहत्तर लोग उस गढ़ी में व्यवस्था से रह रहे थे। उस गढ़ी को विद्रोही सैनिकों ने घेर लिया। उस छोटी गढ़ी में ये पच्चीस अंग्रेज और पचास सिख बड़ी ही मजबूती से अपना संरक्षण कर रहे थे, तब बाहर के सैकड़ों सिपाही उस गढ़ी पर एकदम हमला 1857 का स्वातंत्र्य समर - 266 ¹²⁴ ''ब्राह्मणों ने भी कुंवर सिंह को विप्लव और विद्रोह के लिए प्रोत्साहित किया।'' - 'ऑफिसियल डिस्पैच'