१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकरना छोड़ इधर-उधर से शत्रु को घेरने में लगे हुए थे। कदाचित् ऐसा भी रहा होगा कि गढ़ी तो कब्जे में है ही, उसपर समय गंवाने और मनुष्य हानि करने की अपेक्षा आसपास के क्षेत्र और अन्य अंग्रेजी स्थानों का बंदोबस्त करना विद्रोहियों को अधिक लाभदायी लगा होगा। कुछ इस कारण और कुछ गढ़ चढ़ाकर गोले बरसाने चालू किए। एक-दो बार गुप्त सुरंग खोदकर परकोटे के नीचे बारूद भी लगाई गई। अंदर के लोगों को थोड़े ही दिनों में पानी की बूंद भी मिलना कठिन हो गया। पर अपने गोरे अन्नदाता के ऐसे हाल होते देखकर सिख लोग चुप बैठनेवाले नामर्द नहीं थे। उन्होंने चौबीस घंटे में उस गढ़ी में से जो लड़ रहे हैं वे केवल यूरोपियन नहीं, उनमें अधिकतर सिख हैं यह बात जब खुली तब विद्रोहियों को बहुत खेद हुआ। क्योंकि यह लड़ाई अंग्रेजों के विरुद्ध हिंदुस्थानियों की न होकर गुरु गोविंद सिंह और कुंवर सिंह के बीच हो गई। जो अंग्रेजों की ओर से इतनी विलक्षण शूरता से पर ऐसे नीचे देशद्रोह से लड़ रहे हैं उन सिखों को अपनी तरफ करने के लिए रोज शाम को विद्रोहियों के दूत एक खंभे की आड़ में खड़े हो जोर-जोर से उपदेश करते- "ऐ सिखों! तुम फिरंगियों की ओर से लड़त्रकर किस नरक में जाना चाहते हो? जिन्होंने अपना राज डुबाया, जो अपनी देशमाता पर जबरदस्ती करना चाह रहे हैं, जिन्होंने अपना धर्म अनाथ कर दिया है, उनकी ओर से लड़कर तुम किस नरक का साधन कर रहे हो?" परंतु विद्रोहियों के स्वधर्म, स्वदेश, स्वहित और स्वतंत्रता आदि की हर शपथ से अंग्रेजों का पक्ष छोड़ने के लिए किए गए आनेवाले निवेदनों तथा तुमने यह देशद्रोह न छोड़ा तो हम तुम्हें मार डालने से भी नहीं चूकेंगे-उनकी ऐसी धमकियों का सिखों पर तिल भर असर नहीं हुआ। उलटे अपनों द्वारा किए गए निवेदनों के उत्तर में वे गोलियां चलाते और यह देखकर शाबाश! शाबाश!! कहते हुए यूरोपियन उनकी पीठ ठोंकते। ऐसी स्थिति में उस घेरे को तीन दिन हो गए। तीसरे दिन अर्थात् जुलाई 29 की रात उस गढ़ी की वह छोटी अंग्रेजी सेना से आनेवाली तोपों की गड़गड़ाहट से उछल पड़ी। आनंद से उनके चेहरे प्रमुदित हो उठे। इन विद्रोहियों का नाश कर यह घेरा तोड़ने अंग्रेजी सेना तो नहीं चली आ रही? हां, वह अंग्रेजी सेना ही घेरा तोड़ने के लिए अंत में चली आ रही है। दानापुर में जो गोरी रेजिमेंट थी उसमें से दो सौ गोरे लड़ाके और सौ काले लड़ाके-यह सेना कैप्टन डनबार जैसे साहसी योद्धा के अधीन इकट्ठी होकर आरा में पड़ा घेरा तोड़ने शोण नदी के किनारे आ गई। इस अंग्रेजी सेना के चेहरे पर जो उत्साह और विजय की निश्चिंता दिख रही थी वैसी कभी भी दिखाई न दी होगी। उन्हें विदा करने आए आंग्ल नर-नारियों ने हंसते-मुसकराते उनसे विदा ली। शोण नदी में नावें चलने लगीं और शाम सात बजे 1857 का स्वातंत्र्य समर – 267