भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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प्रकरण-4 दिल्ली हारी अंग्रेजी सेना के तीसरे मुख्य कमांडर द्वार दिल्ली शहर न जीत सकने से निराश होकर त्यागपत्र देने के बाद ब्रिगेडियर विल्सन ने जब मुख्य कमांडर का चार्ज लिया तब विद्रोहियों के आक्रमणों से पगलाई अंग्रेजी सेना के अधिकारियों में दिल्ली का घेरा छोड़कर पीछे जाने का हताश विचार चलने लगा था। घेरा उठाने का वह विचार यदि पक्का हो गया होता तो सन् 1857 का इतिहास कैसा बदला होता, यह सही-सही कहना यद्यपि कठिन है, तथापि विद्रोहियों के हजारो हमलों से अंग्रेजों की जितनी हानि होनेवाली नहीं थी उतनी अंग्रेज पीछे हटकर अपने हाथ से कर लेते, इतना साफ-साफ दिखाई देता है। दिल्ली को घेरने से, शत्रु का शहर कब्जे में कर लेने से अधिक जो दूसरा सैनिक लाभ अंग्रेजों को सहज प्राप्त हो रहा था वह यह कि इससे विद्रोहियों का सैन्य लाभ अंग्रेजों को सहज प्राप्त हो रहा था वह यह कि इससे विद्रोहियों का सैनय सागर दिल्ली जैसे शहर में बंद हो गया था। ऐसा न होता तो वह सारे खुले प्रदेश में फैल गया होता और वह छोटी-छोटी टोलियों में चारों ओर से जूझते रहते तो ऐसे इस छापामार युद्ध से विद्रोहियों को अंग्रेजों पर चारों ओर से कड़े हमले करना और उनकी मुट्ठी भर सेना की मारपीट करना सुलभ हो गया होता। परंतु दिल्ली को घेरे रखकर यह विस्तार पाकर होनेवाला रणक्रंदन सामप्तप्राय हो गया। अंग्रेजों का असह्य कष्ट न देकर सारे विद्रोही एक शहर में जमा होकर स्वतः ही नियंत्रण में आ गए थे। ऐसी स्थिति में दिल्ली का घेरा उठा देने का अर्थ था-इस सेना सागर को सारे प्रदेश पर 1857 का स्वातंत्र्य समर — 272