भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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लगाए जा रहा था तब लखनऊ के अंग्रेज अधिकारियों ने पकड़कर उसे फांसी का दंड दिया था। उस दंड पर कार्यवाही होने के पूर्व उसे फैजाबाद के कारावास में ले जाया गया और इस विदेशी कारावास की कोठरी में से उठाकर उसे सन् 1857 की आंधी ने स्वराज्य सिंहासन की सीढ़ी पर खड़ा कर दिया। वह देशवीर अहमद शाह मौलवी अपने देश की स्वतंत्रता और अपने धर्म की स्थापना के लिए रणक्षेत्र में रंग गया था। जैसा वह समरांगण में शस्त्रयोद्धा था वैसा ही सभारंण के वाक्योद्धा भी था। सभारंण में अपने वाक् शौर्य से वह हजारों देशबंधुओं को मंत्रबद्ध करता और रणांगण में हजारों देशबंधुओं के साथ शस्त्रयुद्ध से शत्रुओं को पाशबद्ध करता और रणांगण में हजारों देशबंधुओं के साथ शस्त्रयुद्ध से शत्रुओं को पाशबद्ध करता था। आलमबाग में चार हजार सेना और तोपों के साथ आउट्रम बैठा था और तात्या टोपे के पेच के कारण सर कोलिन कानपुर में बंधा हुआ था तब लखनऊ इस अवसर पर क्यों न अपने शत्रु को रण से भगा देने के लिए जोर का प्रयास करे, इसलिए मौलवी ने अपने लोगों को उत्तेजित, संगठित और एकीकृत करने के लिए रात-दिन प्रयास किए। अवध की बेगम दरबार में मुख्य राजसत्ताधारी होने से उसके कर्तृत्व से उस लखनऊ शहर में इकट्ठा हजारों भिन्न-भिन्न राजा-महाराजाओ का एकीभवन और संगठित होना जब स्पष्टतया कठिन दिखने लगा, जब अंग्रेजों की मुट्ठी भर सेना को जोरदार हमला कर नष्ट करने के अनंत शुभ प्रसंग लखनऊ की आतंरिक अराजकता और ढील के कारण व्यर्थ गए और जब दिल्ली गिर जाने, कानपुर हारने और फतेहगढ़ हाथ से जाने से उन प्रदेशों के हजारों क्रांतिवीर लखनऊ में आकर अधिक उत्तेजित होने की जगह पहले की अराजकता में अधिक उद्धरता को जोड़ने लगे और अब जबकि विजय से फूले और अगणित सैनिकों से हजार गुना सबल बने अंग्रेजों का अंतिम अनिवार्य हमला निकट आ गया है, हर क्षण ऐसी अति आशंका दिखने लगी, तब इस देशाभिमानी मौलवी ने लखनऊ के दरबार में अपने वाक् तेज से, अपनी बेझिझक करारी टीका से, अपने अप्रतिम कर्तव्य-बल से कितने ही अपनों के हृदय जाग्रत कर दिए। अभी भी एक दिल और अप्रतिहत बल से प्रयास करें तो अंग्रेजों को रणक्षेत्र में पीटना संभव है, यह उसने लखनऊ की राजसभा में आवेश से प्रतिपादित किया; परंतु उसके उस तेज से उत्तेजित न होकर उस राजसभा के कर्तृत्वशून्य और दीपक से डरे लोग और अधिक जलने लगे और कुछ ही दिनों में उस मौलवी को उन्होंने कारागृह में बंद कर दिया। परंतु बेगम से अधिक इस मौलवी का प्रभाव सिपाहियों पर था और उसमें भी दिल्ली की ओर से आई सेना का तो इस मौलवी पर बहुत विश्वास था, इसलिए उसे कारा से तुरंत मुक्त करने के लिए राजदरबार में पूर्ण प्रभाव हुआ और यह आपस के भेदभाव से झगड़ते रहने का अति नाशकारी व्यसन तोड़कर दरवाजे पर थपकी देते बैठे शत्रु का खात्मा करने सब लोग युद्ध के लिए तैयार हो जाएं-यह आवेश उसने फिर से सेना में उत्पन्ना किया। 1857 का स्वातंत्र्य समर — 325