१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकेवल आवेश उत्पन्न कर ही यह योद्धा खाली बैठा नहीं रहा, उसने समय-समय पर सिपाहियों को रणक्षेत्र में जाने को प्रवृत्त किया और जब-जब आलमबाग के अंग्रेजों पर हिंदुस्तानियों ने आक्रमण कि तब-तब सबसे आगे मौलवी की दिव्य मूर्ति झलकती थी। 22 दिसंबर को उसने आलमबाग के अंग्रेजों को धोखे में रख उनकी सेना को पूरी तरह बांधने की एक उत्कृष्ट व्यूह-रचना की थी। स्वयं अपनी सेना के साथ अंग्रेजों को भुलावा देकर कानपुर के रास्ते पर बढ़ लिया और उसने दूसरे सैनिकों से कहा कि हमारे अंग्रेजों की पिछाड़ी पहुंचते ही वे सामने से मार लगाएं। यह बेजोड़ चाल थी। पर 'दूसरे'! यही तो सबकुछ बाधक है। उस एक आत्मा के तेज को प्रत्युत्साह देना तो दूर-कम-से-कम उसका आवश्यक अनुगमन करने का अनुशासन भी दूसरों में नहीं दिखा। हर कोई अपने को सयाना समझता! और रणक्षेत्र में पहली गोली चलते ही सब सामना करना छोड़कर उस ओर पीठ फेरनेवाले। अन्यों के ऐसे भय और अव्यवस्था के कारण मौलवी के स्वयं का काम उत्तम रीति से करने पर भी उस दिन विद्रोही रणांगण में पराजित हुए। फिर भी उनके हतोत्साह को उत्साह का तेज देने के लिए मौलवी और उसके जैसे ही अन्य तेजस्वी नेता अतिशय प्रयास करते रहे। 15 जनवरी को विद्रोहियों को समाचार मिला कि आलमबाग की अंग्रेजी सेना को मदद और रसद पहुंचाने के लिए कानपुर से कुछ अंग्रेज लोग आ रहे हैं। यह वार्त्ता समझते ही वह रसद छीनने के लिए विद्रोहियों में बातचीत चली। पर कोई रास्ता न निकले और न कोई योजना बने। अंत में उन विद्रोहियों के अनिश्चय से चिढ़कर उस अभिजात मौलवी ने सबके सामने शपथ ली कि 'मैं स्वयं यह रसद छीनकर अंग्रेजी शिविर से लखनऊ में प्रवेश करूंगा। ऐसी घोर प्रतिज्ञा कर यह साहसी अपने लोगों के साथ कानपुर के रास्ते पर लुके-छिपे बढ़ गया। परंतु इस हमले का समाचार आउटरम को पहले ही नेटिव दूत से मिल जाने पर उसने मौलवी की सेना पर उलटा हमला करने को अंग्रेजी सेना भेज दी। इस परस्पर हमले का जल्दी ही सामना हुआ। मौलवी ने उस दिन अपने अनुयायियों को वीरश्री चढ़ाने के लिए स्वयं भयंकर युद्ध किया। वह जैसे राजनीति में चमकता था वैसे ही रणनीति में भी चमकने लगा। बेसुध लड़ते-लड़ते इस वीरपुरूष को एक गोली हाथ में लगी और वह नीचे गिरा। इस मौलवी को पकड़ने के लिए अंग्रेजों में स्पर्धा लगी थी, फिर भी विद्रोही उसे डोली में डालकर बड़ी चतुराई से लखनऊ ले आए। मौलवी के घायल हो जाने का सामचार सुनते ही एक विद्रोही-हनुमान नामक शूर ब्राह्मण नेता-ने एक दिन का भी विश्राम न लेकर 17 जनवरी को अंग्रेजों पर हमला किया। प्रातः दस बजे से संध्या तक यह शूर पुरूष रणांगण में लड़ता रहा। पर अंत में उसके अत्यंत घायल होकर गिरते ही विद्रोही रण छोड़कर भागने लगे। इधर दरबार में 1857 का स्वातंत्र्य समर – 326