भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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पृष्ठ 322, कुल 418 में से

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इस हार के कारण आपसी शत्रुता बढ़ गई। कुकर्मी सिपाहियों ने लड़ने के पहले ही पैसा मांगा, अग्रिम वेतन मिलने पर भी फिर से वेतन लिये बिना वे लड़ना नहीं चाहते थे। पर ऐसे अंधेर में उस तेजस्वी और कर्तृत्ववान् बेगम ने राज्यव्यवस्था का अनुशासन उत्तम बनाए रखा था और यही उसके असामान्य मनोधैर्य का प्रमाण था। $^{142}$ पराजय की एक के बाद एक कड़ी जुड़ती जा रही थी, तभी बेगम का अर्थमंत्री राजा बालकृष्ण सिंह मर गया। परंतु ऐसी असंख्य आपत्तियों से वह परास्त नहीं हुई। क्योंकि जिसे अंग्रेज का दरवाजे पर खड़े रहना भी मृत्यु से अधिक लज्जाजनक लगता था वह फिर रणक्षेत्र में कूद पड़ता और इस कूदने में उसकी कूद भी सबके आगे रहती-ऐसा वीरपुत्र और कोई न होकर मौलवी अहमद शाह ही था। रणांगण में हुआ असह्य घाव अच्छा होते-न-होते उसने 5 फरवरी को फिर सारी सेना लेकर रण की ओर दौड़ लगाई। मौलवी का सारा श्रम व्यर्थ होकर उस दिन भी विद्रोहियों का फिर से पराभव हो गया। फिर भी मौलवी ने लड़ाई जारी रखी। इस वीर की शूरता से चकित होकर इतिहासकार होम्स अपनी पुस्तक में लिखता है-“यद्यपि बहुसंख्या में विद्रोही डरपोक और हिम्मत हारनेवाले थे, फिर भी उनका नेता अपनी निष्ठा से और कर्तृत्व से उदात्त ध्येय का पीछा करनेवाला और सेना का नेतृत्व स्वीकारने योग्य था। यह नेता अर्थात् अहमदउल्ला-फैजाबाद का मौलवी।” $^{143}$ 60वीं रेजिमेंट के एक सूबेदार ने आठ दिन में अंग्रेजों को भगा देने की प्रतिज्ञा की और उसने भी फिर से हमले किए। एक दिन स्वयं बेगम साहिबा भी सेना के साथ बाहर निकली। परंतु उस अभागे लखनऊ को विजय नहीं मिली। विजय मिले तो कैसे? 1857 का स्वातंत्र्य समर – 327 $^{142}$ 1. सर डब्ल्यू रसेल ने इस बेगम के संबंध में कहा-“सिपाही सेना का प्रचंड भाग लखनऊ में ही है, ऐसा समझा जाता है; किंतु वे उस वीरता सहित नहीं लड़ेंगे जिस वीरता सहित अवध के रक्षक संग्राम करेंगे, जिन्होंने अपने युवा सम्राट् बिर्जिस कादिर के हितों को अक्षुण्ण रखने के लिए अपने प्रमुखों का अनुगमन किया है। और इनके संबंध में निश्चित रूप से ही यह कहा जा सकता है किवे देशभक्ति के युद्ध में लिप्त हैं, जिसे वे अपने देश और सम्राट् के लिए लड़ रहे हैं। रेजीडेंसी के घेरे में भी सिपाहियों ने खुलकर रणभूमि में ऐसा युद्ध कभी नहीं किया जैसी निर्भीकता सहित जमींदारों और उनके प्रजाजनों ने किया। बेगम ने तो अपनी महान् शक्ति और योग्यता का जो परिचय दिया है, उसने संपूर्ण अवध को ही अपने पुत्र के पक्ष में उठाकर खड़ा कर दिया और सरदार तथा सामंत भी उसके प्रति पूर्णतः निष्ठावान् थे। हम तो उनके पुत्र के वैध अधिकारी हाने में अविश्वास व्यक्त कर सकते हैं; किंतु जमींदार, जो वास्तव में इस प्रश्न पर सही निर्णायक कहे जा सकते है, निस्संकोच ही बिर्जिस कादिर को उत्तराधिकारी स्वीकार करते थे। सरकार इन लोगों से विद्रोहियों जैसा व्यवहार करेगी अथवा संभावित शत्रुओं के समान। बेगम ने हमारे विरूद्ध अखंड युद्ध की घोषणा की है। इन रानियों और बेगमों के शक्तिपूरक चरित्र से ऐसा प्रतीत होता है कि इन्हें अपने रनिवासों और हरमों में प्रचुर मानसिक शक्ति प्राप्त होती थी और वे किसी भी स्थिति में योग्य पग उठाने में समर्थ थीं।” -'रसेल की डायरी', पृष्ठ 275 $^{143}$ 2. होम्स कृत-'सेपॉस वार'।

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