भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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विजय पुरुषार्थी की दास है। वह पुरुषार्थ विद्रोहियों ने लखनऊ के युद्ध में दिखाया होता तो विजय दूर नहीं थी। पहले लिखे अनुसार अंत में सर कोलिन आलमबाग की अंग्रेजी सेना से आकर मिला। लखनऊ शहर को परास्त करने को आज एक वर्ष से अंग्रेजी सत्ता प्रयासरत थी। तथापि उसके अनेक आक्रमणों की परवाह न कर यह शहर आज तक स्वराज्य के झंडे तले दृढ़ता से खड़ा था। परंतु अब उसे परास्त किए बिना अंग्रेजी सेना वापस नहीं लौटेगी। इस समरांगण में अब या तो अंग्रेजी सत्ता परास्त होगी या भारतीय सत्ता, ऐसी अंतिम वेला आ गई है। अंग्रेजी सत्ता ने जैसे अपनी सारी शक्ति इस समय एकत्रित की थी वैसे ही विद्रोहियों की भी सारी शक्ति एकत्रित हुई थी। जगह-जगह से स्वतंत्रता भक्त लखनऊ के ध्वज की ओर आ रहे थे। चार्ल्स बाल ने 'इंडियन म्युटिनी-, खंड 2 के पृष्ठ 241 पर लिखा है- "मधुमक्खियों के समान प्रदेश भर से हजारों आवारा लोगों और स्वयंसेवकों के झुंड-के-झुंड सशस्त्र होकर फिरंगियों से होनेवाले अंतिम संघर्ष में भाग लेने तथा मरने के लिए अपने सेनापति के पास एकत्र हो रहे थे।" उन्होंने लखनऊ शहर के घर-घर में गोलीबारी करने को छेद बनाकर रखे थे। गोमती की बड़ी-बड़ी नहरें खोदकर शहर के पूर्वी भाग में मजबूती लाई, दिलखुश बाग से केसर बाग के राजमहल तक संरक्षण के लिए बड़ी-बड़ी दीवारें बांधी! उस शहर में अवध और अन्य प्रदेशों के विद्रोही मिलकर लगभग अस्सी हजार योद्धा सशस्त्र तैयार थे। सारांश यह कि उस शहर के उत्तर में छोड़कर सब दिशाओं से जंगी लश्करी तैयारी की हुई थी। इसीलिए सर कोलिन ने इस उत्तर दिशा की ओर से ही विद्रोहियों पर पहले-पहल हमला किया। पहले हैवलॉक, आउट्रम और स्वयं कोलिन कोई भी इस दिशा से न आया, इस कारण और उसी दिशा में गोमती नदी बहने से विद्रोहियों की ऐसी कल्पना थी कि शहर की उत्तर दिशा में कोई विशेष प्रबंध आवश्यक नहीं है। परंतु सर कोलिन न आउट्रम को उसी दिशा में भेजकर जब विद्रोहियों के मर्म स्थान पर एकाएक हमला किया तब उनकी पहले की सारी योजना ढहने लगी। सर कोलिन के अधीन अब कुल तीस हजार तैयार सेना थी। 144 अतः उसने दिलखुश बाग में अपना डेरा लगा विद्रोहियों से शहर का पूर्वी भाग जीत लिया। 6 मार्च को अंग्रेजी सेना ने लखनऊ पर उत्तर और पूर्व की ओर से घेरा कसना शुरू किया। सर कोलिन की व्यूह-रचना ऐसी थी कि विद्रोहियों के चारों ओर से पूरी नाकेबंदी करते हुए उन्हें लखनऊ से भागना असंभव कर दे। 6 से 15 मार्च तक तो लखनऊ अपने शत्रु से दिन-रात जूझता रहा। अंग्रेजी सेना दिलखुश बाग से कदम रसूल, शाहनजीफ, बेगम कोठी आदि स्थान पर कब्जा करते आगे बढ़ती रही। 10 मार्च को अंग्रेजी योद्धा हडसन को विद्रोहियों ने मार गिराया। इस हडसन ने 1857 का स्वातंत्र्य समर - 328 144 नैरेटिव्स ऑफ द म्युटिनी', पृष्ठ 405 ।