१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
पृष्ठ 324, कुल 418 में से
संदर्भ में पढ़ेंही दिल्ली के आत्मसमर्पित शहजादों की गोली मारकर हत्या की थी। लखनऊ ने उस पापी अधम को मारकर दिल्ली का बदला लिया। तारीख 14 तारीख को लखनऊ के राजमहल में अंग्रेजी सेना घुसी। इस संपूर्ण सफलता का वर्णन करते मैलसन लिखता है-‘’इस यश की उपलब्धि का मुख्य कारण सिख सैनिक तथा 10वीं पलटन ही थी।‘’145 पर सर कोलिन के मन पर केसर बाग की इस सफलता का आनंद उछल रहा था, तभी आउट्रम की ओर से प्राप्त समाचार से निराशा हुई। क्योंकि लखनऊ शहर की यद्यपि हार हुई, फिर भी हजारों विद्रोही अपने युवा राजपुत्रों और उस अकुंठित बेगम के साथ अंग्रेजों के प्रतिशोध को विफल करते हुए लड़ते-लड़ते बाहर निकल गए। लखनऊ शहर में रक्त की मूसलाधार बरसात में और राजमहल सहित सभी स्थानों पर विजयी मुट्ठी भर अनुयायियों के साथ फिर से शहर में प्रवेश कर रहा है, क्योंकि फिरंगी लखनऊ को परास्त करें-यह बात उस शूर के हृदय में कालकूट विष जैसा घाव करने लगा। प्राणों की चिंता छोड़, अपमान के क्रोधित, देशभक्ति से दीवाना वह मौलवी शहर के मध्य में घुसकर शत्रु की सेना द्वारा उसे पदाक्रांत करने के बाद भी जैसे मैजिनी उस शहर से अकेला ही चिपका रहा वैसे ही यह मौलवी लखनऊ लौटा। शहादतगंज के एक बंद भवन में केवल दो तोपें लेकर वह अंग्रेजों का भारी प्रतिकार करता हुआ वहीं जमा रहा। उसे यहां से भगाने के लिए जिसने 21 मार्च को पहले ही दिन बेगम कोठी जीत ली थी उस न्यू गार्ड को कुछ सेना के साथ साथ गया। न्यू गार्ड के साथ 93वीं हायलैंडर पलटन और चौथी पंजाब राइफल के सैनिक थे। परंतु विद्रोहियों ने आज अपूर्व शौर्य प्रदर्शित किया। उन्होंने धीरज से अपना संरक्षण किया और हमारी ओर से अनेक सैनिकों को मारकर और अनेक को घायल करके ही वे बाहर आए।‘’146 लखनऊ शहर का यह अंतिम युद्ध था। थोड़ी देर में युद्ध की वीरता का नशा उतरते ही उसकी दृष्टि में आया कि जिस झंडे के लिए मैं यह युद्ध कर रहा हूं वह 1857 का स्वातंत्र्य समर - 329 145 1. के एवं मैलसन कृत-‘इंडियन म्युटिनी’, खंड 4, पृष्ठ 270 । 146 2. के एवं मैलसन कृत-‘इंडियन म्युटिनी’, खंड 4 , पृष्ठ 286 ।