१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराजध्वज अब लखनऊ पर है ही नहीं और वह मेरी तलवार की प्रतीक्षा करता उधर वनवास में खड़ा है। विद्रोहियों ने अंग्रेज कैदियों के जो हाल किए, उसके नमूने के लिए दो-चार चित्र यहां दिए जा रहे हैं। लखनऊ की कारा में कुछ अंग्रेज स्त्रियां और अंग्रेज अधिकारी थे। लखनऊ ने उनके प्राण न लेकर छह माह से कैद में रखा था। परंतु जब अंग्रेजी सेना सर कोलिन के पहले आक्रमण के समय राह चलते नागरिकों को काटने घुसी तब उससे संतप्त हुए सिपाही`सर बाग के राजमहल में जाकर जोरों से मांग करने लगे कि अंग्रेज कैदी अभी-के-अभी हमें सौंपे जाएं। कोई उपाय न रहने से के. आर. सर माउंट स्टुअर्ट आदि पांच-छह गोरे नेताओं को सिपाहियों को सौंपते ही उन्होंने गोली मारकर उन्हें मार डाला। परंतु तुरंत सिपाही गोरी महिलाओं को भी मार डालने की जिद करने लगे। तब “बेगम ने नारी जाति के नाम पर ऐसा करने से स्पष्टतः मना कर दिया। उन्होंने सभी अंग्रेज महिलाओं को अपने जनानखाने में लाकर उनकी प्राण-रक्षा भी की।|’’147 बेगम ने गोरी महिलाओं को उन्हें सौंपने से साफ मना किया और उनका स्वयं राजस्त्रियों के निवास में पोषण किया। अब अंग्रेज लखनऊ शहर के नागरिकों पर कैसे जुल्म ढा रहे थे, यह भी उनके प्रसिद्ध लेखकों से उगलवा लें। विद्रोही और अवध के सभी लोग विद्रोही थे-पांच वर्ष से अस्सी वर्ष तक के सभी सशस्त्र लोगों को मार डाला गया-हाथ में आए ब्रिद्रोहियों में से सैकड़ों घायल लोगों को धड़ाधड़ गोली मारकर मार डालना, गांवों को आग लगाकर भस्म करना आदि बातें तो नित्य चल रही थीं। परंतु इससे भी अधिक दानवी प्रक्रिया के उदाहरण-लेखक डॉ. रसेल की दृष्टि में पड़ी। उनमें से एक का वह वर्णन करता है-“परंतु उनमें से एक को घर के बाहर जीवित तप्त बालू पर खींचकर लाया गया। वहां उसे अंग्रेजी सिपाहियों ने संगीनों से छेदकर दबाकर रखा था। शेष सोल्जर उसे जलाने के लिए लकड़ी बीनने चले गए थे और जब सारी तैयारी हो गई तब उस सिपाही को सुलगी चिता पर जीवित ही भूना गया। यह कृत्य करनेवाले सारे अंग्रेज लोग ही थे और उनके अनेक अधिकारी यह सब देखते वहीं खड़े हुए थे। फिर भी फड़फड़ाता बाहर आया तब यह आसुरी कर्म परमोच्च बिंदु पर पहुंचा। विलक्षण रूप से छटपटाते हुए ज बवह चिता से बाहर कूदा तब जलते मांस के लोथड़े उसकी खुली हड्डियों से लटक रहे थे और वह पकड़े जाने के पहले ऐसी अवस्था में भी कुछ दूर दौड़ गया। परंतु उसे फिर पकड़ा गया और संगीनों से कोंचकर फिर चिता पर 1857 का स्वातंत्र्य समर - 330 147 1. चार्ल्स बाल कृत-'इंडियन म्यूटिनी', खंड 2, पृष्ठ 94।