१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंढकेला गया और उसके अधजले अवशेष पूरे जलाए गए।‘ शहर में ऐसा कत्लेआम चल रहा था तब एक कश्मीरी लड़का एक अंधे बूढ़े को साथ लेकर वहां के एक अंग्रेज अधिकारी के पास आया और उसे भूमि पर लेटकर नमस्कार करते हुए जीवनदान की भीख मांगने लगा। उस अधिकारी ने पिस्तौल निकाली और उस अभागे शरणगत के सिर पर गोली चला दी। उसने फिर घोड़ा दबाया-फिर पिस्तौल चलाई-फिर गोली चूक गई। पुनः घोड़ा दबाया-उस गोली ने उस लड़के मारने से फिर एक बार नकार दिया-“चौथी बार यह वीर यशस्वी हुआ और उसके पैरों के पास भू-लुंठित होता हुआ वह बालक दम तोड़ गया।“148 दिल्ली गिरी, लखनऊ भी गिरा, पर क्रांतियुद्ध का जोर कम नहीं हुआ। यह अनपेक्षित स्थिति देखते हुए भी यह क्रांति सिपाहियों ने ही की थी और उसके पीछे असंतोष के एक-दो कारण ही थे, यह मानकर हम बड़ी चूक कर रहे हैं-अंग्रेजों को यह विश्वास हो गया। यह कोई बंड (विद्रोह) नहीं था, यह तो स्वतंत्रता के लिए ठना एक युद्ध था। यह एक-दो असंतोषों से उपजा विद्रोह नहीं था। इसकी तली में अनंत दुःखों को जन्म देनेवाली राजनीतिक परतंत्रता ही थी। इस क्रांति के मूल में क्षुद्र व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं था। स्वतंत्रता की पवित्र ज्योति, स्वधर्म और स्वराज्य की उदात्त ध्येय-भावना ही यहां सुलग रही थी। केवल सिपाही अपना निजी स्वार्थ साधने के लिए स्वतंत्रता के पवित्र ध्येय से समरस थे, ऐसा नहीं! वरन् सभी सफेदपोश जनता, शहर की तरह ही गांव की जनता, भी इस क्रांति में प्रमुखता से सहभागी हो गई थी। यदि ऐसा न होता तो यह शक्ति, यह कृतनिश्चय, यह साहस और निस्वार्थ भाव भूल से भी दिखाई नहीं देता; क्योंकि इसी समय लॉर्ड केनिंग ने 'जो कोई विद्रोह से शामिल होगा उसकी सारी संपत्ति और उत्पादन जब्त किए जाएंगे और जो शरण आएंगे उन्हें क्षमा किया जाएगा। ऐसा घोषणापत्र जारी किया था। फिर भी क्रांतिकारियों ने शस्त्र नीचे नहीं रखे। लखनऊ हार गया, पर अवध ने युद्ध जारी ही रखा। डॉ. डफ इस प्रचंड क्रांति के संबंध में लिखता है-“यदि यह केवल सिपाहियों का विद्रोह होता और बहुसंख्य जतना की सहानुभूति और सहायता उन्हें न होती तो उनपर हमें जो पहले दो-चार प्रचंड विजयें प्राप्त हुई उसी में हम उनका कचूमर निकाल दिए होते; परंतु कचूमर निकालना तो दूर रहा, उलटे वे अधिक ही चैतन्य दिखाई देने लगे और विद्रोह का फैलाव पहले से अधिक हो गया। और वह अधिक उग्र स्वरूप भी धारण कर रहा है। यह सीधी-साधा सिपाहियों का विद्रोह न होकर एक क्रांतिकारी विद्रोह ही था-यह दिखाई देता है और इसीलिए उसे पूरी तरह शांत करने में हमें सफलता कम ही मिली और आगे भी वह शीघ्र शांत होगा, ऐसा नहीं लगता। इस तरह यह विद्रोह दीर्घकालिक और उद्देश्यपूर्ण क्रांति था, जिसमें हिंदू-मुललमान नामक विसंगत 1857 का स्वातंत्र्य समर – 331 148 1. रसेल की डायरी, पृष्ठ 385।