१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
ढकेला गया और उसके अधजले अवशेष पूरे जलाए गए।‘ शहर में ऐसा कत्लेआम चल रहा था तब एक कश्मीरी लड़का एक अंधे बूढ़े को साथ लेकर वहां के एक अंग्रेज अधिकारी के पास आया और उसे भूमि पर लेटकर नमस्कार करते हुए जीवनदान की भीख मांगने लगा। उस अधिकारी ने पिस्तौल निकाली और उस अभागे शरणगत के सिर पर गोली चला दी। उसने फिर घोड़ा दबाया-फिर पिस्तौल चलाई-फिर गोली चूक गई। पुनः घोड़ा दबाया-उस गोली ने उस लड़के मारने से फिर एक बार नकार दिया-“चौथी बार यह वीर यशस्वी हुआ और उसके पैरों के पास भू-लुंठित होता हुआ वह बालक दम तोड़ गया।“148 दिल्ली गिरी, लखनऊ भी गिरा, पर क्रांतियुद्ध का जोर कम नहीं हुआ। यह अनपेक्षित स्थिति देखते हुए भी यह क्रांति सिपाहियों ने ही की थी और उसके पीछे असंतोष के एक-दो कारण ही थे, यह मानकर हम बड़ी चूक कर रहे हैं-अंग्रेजों को यह विश्वास हो गया। यह कोई बंड (विद्रोह) नहीं था, यह तो स्वतंत्रता के लिए ठना एक युद्ध था। यह एक-दो असंतोषों से उपजा विद्रोह नहीं था। इसकी तली में अनंत दुःखों को जन्म देनेवाली राजनीतिक परतंत्रता ही थी। इस क्रांति के मूल में क्षुद्र व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं था। स्वतंत्रता की पवित्र ज्योति, स्वधर्म और स्वराज्य की उदात्त ध्येय-भावना ही यहां सुलग रही थी। केवल सिपाही अपना निजी स्वार्थ साधने के लिए स्वतंत्रता के पवित्र ध्येय से समरस थे, ऐसा नहीं! वरन् सभी सफेदपोश जनता, शहर की तरह ही गांव की जनता, भी इस क्रांति में प्रमुखता से सहभागी हो गई थी। यदि ऐसा न होता तो यह शक्ति, यह कृतनिश्चय, यह साहस और निस्वार्थ भाव भूल से भी दिखाई नहीं देता; क्योंकि इसी समय लॉर्ड केनिंग ने 'जो कोई विद्रोह से शामिल होगा उसकी सारी संपत्ति और उत्पादन जब्त किए जाएंगे और जो शरण आएंगे उन्हें क्षमा किया जाएगा। ऐसा घोषणापत्र जारी किया था। फिर भी क्रांतिकारियों ने शस्त्र नीचे नहीं रखे। लखनऊ हार गया, पर अवध ने युद्ध जारी ही रखा। डॉ. डफ इस प्रचंड क्रांति के संबंध में लिखता है-“यदि यह केवल सिपाहियों का विद्रोह होता और बहुसंख्य जतना की सहानुभूति और सहायता उन्हें न होती तो उनपर हमें जो पहले दो-चार प्रचंड विजयें प्राप्त हुई उसी में हम उनका कचूमर निकाल दिए होते; परंतु कचूमर निकालना तो दूर रहा, उलटे वे अधिक ही चैतन्य दिखाई देने लगे और विद्रोह का फैलाव पहले से अधिक हो गया। और वह अधिक उग्र स्वरूप भी धारण कर रहा है। यह सीधी-साधा सिपाहियों का विद्रोह न होकर एक क्रांतिकारी विद्रोह ही था-यह दिखाई देता है और इसीलिए उसे पूरी तरह शांत करने में हमें सफलता कम ही मिली और आगे भी वह शीघ्र शांत होगा, ऐसा नहीं लगता। इस तरह यह विद्रोह दीर्घकालिक और उद्देश्यपूर्ण क्रांति था, जिसमें हिंदू-मुललमान नामक विसंगत 1857 का स्वातंत्र्य समर – 331 148 1. रसेल की डायरी, पृष्ठ 385।
जोड़ी कंधे से कंधा लगाए मित्र बनकर लड़ने खड़ी हो गई थी; जिसको बढ़ाने और फैलाने में अवध की पूरी जतना लगी हुई थी और जिसे प्रत्यक्ष रीति से पड़ोस के सभी प्रदेशों की सक्रिय सहानुभूति मिली हुई थी। वह विद्रोह विद्रोही सिपाहियों पर प्राप्त दो-चार शुद्ध एवं अभूतपूर्व जीतों से दबा देना संभव नहीं था। “एकदम प्रारंभ से इस ‘विद्रोह’ को सेना के बाहर फैली विस्तृत जनशक्ति ने अंग्रेजों के प्रभुत्व के विरुद्ध एवं उनकी राज्यसत्ता के विरुद्ध क्रांतिकारी विद्रोह का स्वरूप ही प्राप्त हो गया था। हमारी वास्तविक लड़ाई पूरी तरह विद्रोही सिपाहियों के साथ ही थी, यह पूरी तरह झूठ है। हमारे शत्रु केवल सिपाही होते तो देश में शांति स्थापित करने में चुटकी बजाने से अधिक का समय नहीं लगता। “शत्रु को पूरी तरह तितर-बितर कर उनकी तोपें अपने कब्जे में लिये बिना हमने शत्रु को एक भी लड़ाई में नहीं छोड़ा; पर बार-बार लगातार और कई बार पिटने के बाद भी ये लोग फिर ताजा होकर नई लड़ाई के लिए तैयार दिखाई देते थे। एक प्रांत पर कब्जा कर अंग्रेजी सेना वहां शांति व्यवस्था बनाती तो दूसरे प्रदेश में तभी विद्रोह की आंधी चलती। महत्त्व के स्थानों को जोड़नेवाला कोई राजमार्ग खोला जाता तो तुरंत उसकी नाकेबंदी कर वहां का यातायात तोड़ दिया जाता। एक विभाग से विद्रोहियों को जैसे ही भगाया जाता वैसे ही दुगुनी-तिगुनी संख्या में वे दूसरे किसी विभाग में खड़े दिखाते देते। हमारी सेना उनकी सेना पर झपटकर आक्रमण करती हुई आगे बढ़ती जाती तो विद्रोहियों की टुकड़ियां पिछला सारा प्रदेश अपने कब्जे में ले लेतीं।‘‘149 डॉ डफ द्वारा लिखे गए वास्तविक सत्य की पहचान अंग्रेजों को बहुत अंत में हुई। परंतु पांडे लोगों में से हर एक को बिलकुल प्रारंभ से इसकी पूरी अनुभूति थी। अपने राजा और अपने देश के लिए उन्होंने समरांगण में प्राण दिए। वे ये बातें स्पष्ट बोलते थे, पर उनकी स्त्रियों ने भी वास्तव में उतना ही कठोर निश्चय प्रकट किया था। जब शूरवीर अंग्रेजों ने लखनऊ के जनानखाने पर हमला किया तब उन्हें अंतःपुर में कुछ स्त्रियां मिलीं। दरवाजा तोड़कर अंदर घुसने पर अंग्रेज सोल्जरों ने यहां भी गोलियां दागीं जिससे कुछ स्त्रियां मर गईं। जो बचीं उन्हें कैद में रखा गया। लखनऊ को जला डाला गया। वह सब देखकर अब विद्रोही तुरंत शरण में आ जाएंगे, इस कल्पना से अंग्रेज खुश हुए। अपने देशबंधुओं के इस आनन्दोन्माद में सहभागी अंग्रेज जेलर उन रानियों को खिझाने के लिए पूछता,‘‘विद्रोह पूरी तरह विफल हो गया है, ऐसा तुम्हें नहीं लगता?‘‘ उस समय उन कृतनिश्चयी बेगमों ने स्पष्ट कहा, ‘‘इसे कुचलना तो बहुत दूर की बात है, अंततोगत्वा पराजय तुम्हारी ही होगी।‘‘150 1857 का स्वातंत्र्य समर – 332 149 1. डॉ डफ कृत-‘इंडियन रिबेलियन’, पृष्ठ 241-43 । 150 2. ‘नैरेटिव ऑफ दि इंडियन म्यूटिनी’, पृष्ठ 300; रसेल की डायरी, पृष्ठ 400।
प्रकरण-8 कुँवर सिंह और अमर सिंह जगदीशपुर की घाटी से होअर की शिकारी टोली द्वारा भगाए जाने के बाद राजमहल का सिंह वृद्ध युवा कुंवर सिंह अब अपनी स्वतंत्रता पर घात करनेवाले के कंठ पर कब प्रबल हमला कर सके, इस अवसर की ताक में पश्चिम बिहार के वनों में छिपते-छिपाते चक्कर काट रहा था। उसकी अयाल गुस्से से खड़ी थी, उसके पंजे बदला लेने के लिए फैले हुए और उसके नेत्र शत्रु की गरदरन पर झपट पड़ने के यौगय अवसर की ताक में थे। जैसे अपनी कोठरी में घूमता सिंह हो वैसे ही वह सिंह उन झाड़ियों में इस सिरे से उस सिरे तक चक्कर काट रहा था। उस सिंह के साथ उसके अन्य शावक भी थे। उसके भाई अमर सिंह, निस्स्वार सिंह व जवान सिंह। ये लोग भी अपने-अपने अनुयायियों के साथ वहां आए थे। और तो और, उसकी प्रिया सिंहनी भी युद्धवेश में उस राज्य में अपने वनराज के साथ रिपुरक्त-पान करने को सज्जत थी। शाहाबाद जिले में उसकी वंश परंपरागत भूमि विदेशियों के कब्जे में थी, उसकी सेना थोड़ी सी थी-एक हजार दो सौ सिपाही और अधिकारी और कोई चार सौ अशिक्षित नौकर उसके पास थे। उसके जगदीशपुर के राजमहल में विदेशी शत्रु का अमंगल डेरा पड़ा हुआ था। उसके देवालयों और देवमूर्तियों का उन्मुक्त म्लेच्छों ने चकनाचूर कर दिया था। इस सब अपमान से वह चिढ़ गया था, फिर भी कुंवर सिंह गुस्से के अधीन नहीं हुआ 1857 का स्वातंत्र्य समर - 333
था। उसने जनहानि न होने दी और जिस दिन जगदीशपुर छोड़ा उसी दिन केवल मनोविकारों का दास न होकर और आवेश में विजय अवसर न चूकते हुए एक नई पद्धति का युद्ध लड़ने की योजना बनाई थी। वह जगदीशपुर पर यकायक हमला करने नहीं गया था और शहाबाद प्रदेश में भी उस दृष्टि से नहीं रुका रहा। उस प्रदेश पर और राजधानी पर अंग्रेजों का मजबूत बंदोबस्त था, यह उसे ज्ञात था। इसलिए उसने राजधानी हारने की बिलकुल चिंता नहीं की। उसे जो चिंता थी वह यह कि राजधानी हारे या जीते, मेरे स्वातंत्र्य युद्ध का जरतारी ध्वज अटल लहराता रहना चाहिए। उसकी नई पद्धति स्वतंत्रता संग्राम की अनन्य संजीवनी है। उस युद्ध पद्धति का नाम ‘छापामार युद्ध’ है। इसलिए अपने अपमान के क्षोभ से अंग्रेजों की सबल सेना पर दीप-पतंग-त्वरा से न झपटते हुए कुंवर सिंह उस पश्चिम बिहार के वन में शोण नदी के किनारे-किनारे अंग्रेजों के दुर्बल स्थान टटोलता छिपा हुआ था। लखनऊ के निःपात के लिए आजमगढ़ की ओर से अधिकतर नेपाली और अंग्रेजी सेना अवध की ओर चल पड़ी है, यह सूचना उसे मिली। उसकी तीव्र नाक को इस शिकर की गंध आते ही जगदीशपुर का सिंह हमला करने उस वन से बाहर निकला। क्रोध और मनोविकार के क्षणिक समाधान के अधीन होनेवाले दुर्बल लोगों की तरह विजय की संभावना कम होते हुए भी एक राजधानी के चारों ओर ही घूमते रहनेवाला वह आदमी नहीं था, वह तो सिद्धांत की अंतिम विजय जिधर दिखे उधर ही समर करनेवाला छापामार वीर था। लखनऊ की ओर सारी अंग्रेजी सेना जा रही थी, पर अंग्रेजों की आंखें जगदीशपुर की ओर होने से कुंवर सिंह ने अभी उस ओर जाने की योजना नहीं बनाई। पूर्व अवध में जहां अंग्रेजी मजबूती बिलकुल ढीली पड़ी थी उसने उधर झपट्टा मारने की योजना बनाई। अवध में घुसते ही वहां के अनेक विद्रोहियों को इकट्ठा कर आजमगढ़ पर हल्ला करें और वहां विजय मिलते ही श्री काशी क्षेत्र पर या इलाहाबाद पर भी हमला करें और इस तरह जैसे को तैसा बनकर जगदीशपुर का बदला लिया जाए-ऐसा दांव सोचकर कुंवर सिंह पूर्व अवध की ओर निकला । सन् 1857 की 18 मार्च को बेतवा के विद्रोही उससे आकर मिले और उस संयुक्त सेना ने अतरोलिया के किले के पास अपना शिविर लगाया। आजमगढ़ अतरोलिया से पच्चीस मील दूर था। कुंवर सिंह की सेना इतनी पास आ गई है, यह समझते ही, कोई तीन सौ पैदल और घुड़सवार, दो तोपें-इतनी अंग्रेजी सेना लेकर मिलमन अतरोलिया की ओर बढ़ा। 22 मार्च का बेतवा के विद्रोही उससे आकर मिले और उस संयुक्त सेना ने अतरोलिया के किले के पास अपना शिविर लगाया। आजमगढ़ अतरोलिया से पच्चीस मील दूर था। कुंवर सिंह की सेना इतनी पास आ गई है, यह समझते ही, कोई तीन सौ पैदल और घुड़सवार, दो तोपें-इतनी अंग्रेजी सेना लेकर मिलमन अतरोलिया की ओर बढ़ा। 22 मार्च को प्रातःकाल की सूर्य किरण रण-मैदान को स्पर्श भी न कर पाई थी कि मिलमन और क्रांतिकारी सेना की आंखें मिलीं। एकाएक बढ़ आई अंग्रेजी सेना को देखकर झिझके विद्रोहियों को क्षण भर का भी अवसर न देकर मिलमन ने लड़ाई प्रारंभ कर दी। विद्रोही लड़ने लगे, पर वे विद्रोही अंग्रेजों से कितने लड़ पाते? उनकी तुरंत पराजय हुई। कुंवर सिंह ने इतने तामझाम से हमला किया था, उसकी इस अंग्रेजी सेना ने कैसी फजीहत की। सारी रात चलकर आए होते हुए भी विद्रोहियों से इतने जोर से लड़नेवाली अंग्रेज सेना और उसके सेनानी 1857 का स्वातंत्र्य समर – 334
सचमुच शाबासी पाने योग्य हैं। तुम अपना सुबह का कलेवा गाढ़े पसीने की कमाई से नहीं, गाढ़े रक्त की कमाई से कर रहे हो, इसलिए सारे अंग्रेज सैनिकों, अपने सेनानी के साथ उस अमराई में शांति से बैठकर उस बाल सूर्य की किरणों और विजय के आनंद में अपना कलेवा ग्रहण करो। शस्त्र एक तरफ रखे गए, कलेवा तैयार हुआ, भूख के समय कौर मुंह तक गया-प्यास मिटाने गिलास होंठो तक गया। उतने में- हा! हा! यह क्या? होंठों से लगता गिलास छूट गया, मुंह का कौर मुंह में रहा। कलेवा के पात्र तड़ातड़ टूटे। शस्त्र सपासप बाहर आए अरे, कुंवर सिंह तो नहीं आया? हां, हा, मदमस्त आंग्ल गज के गंडस्थल पर हमला करके कोसिला से ब्रिटिश सेना को जो पीछे हटाना आरंभ किया तो सीधे आजमगढ़ तक कुंवर सिंह ने उस अभागे मिलमन को दौड़ाया। आजमगढ़ में पहुंचने के बाद मिलमन की जान में जान आई। उसके आवश्यक संदेश के कारण कोई तीन सौ पच्चीस लोगों की नई कुमुक बनारस और गाजीपुर से भेजी गई और इस सारी सेना के सेनापति पद पर कर्नल डेम्स की नियुक्ति हुई। अब आजमगढ़ जैसी मजबूत जगह, दोगुनी बढ़ी हुई अंग्रेजी सेना और कर्नल डेम्स जैसा ताजा दम सेनापति, तब पिछली मामूली पराजय का प्रतिशोध लेने की बात क्यों न सोची जाए? इसलिए कर्नल डेम्स 27 मार्च को आजमगढ़ छोड़कर कुंवर सिंह को मजा चखाने निकला। बाहर निकलते ही वह जीत भी गया और कुंवर सिंह पर ऐसी जीत पाते ही उस भयानक नाटक का ही एक भयानक प्रयोग शुरू हो गया। कुंवर सिंह ने इस नए सौल्जरों और नए सेनापति को ऐसा थप्पड़ लगाया कि कर्नल डेम्स मैदान छोड़ सीधे आजमगढ़ की ओर भाग और शहर की दीवारों के पीछे जाकर छिप गया। उसकी सेना में से कोई कुंवर सिंह पर आक्रमण के लिए बाहर मुंह निकालने को भी तैयार नहीं था। अंग्रेजों की यह पराजय सुनकर इलाहाबाद में बैठे अंग्रेज गवर्नर का चेहरा चिंता से काला हो गया। "इस चढ़ाई के समय गवर्नर जनरल केनिंग इलाहाबाद में ही था। केनिंग कुंवर सिंह की युद्ध-क्षमता, धैर्य, बहादुरी आदि सभी गुणों से परिचित था। अतः आनेवाले संवाद का रूप उसके सामने स्पष्ट था।151 हर नए दिन उसके पास नई सेना इकट्ठी होती जा रही थी। लखनऊ में हारकर भागे हुए सिपाही भी अब उसके झंडे की ओर दौड़ते चले आ रहे थे और जिसमें इस हारी एवं असंगठित सेना को भी सफलता दिलानेवाले छापामार कुशलता वास कर रही थी, वह जगदीशपुर का राणा शीघ्र ही आजमगढ़ को ताला लगाकर बीच के इक्यासी मील की यात्रा कर और बनारस शहर पर अचानक हमला करके इलाहाबाद में गवर्नर जनरल और लखनऊ में कमांडर-इन-चीफ दोनों की ही कलकत्ता से जुड़ी डोर काटने से चूकेगा नहीं, यह तुरंत लॉर्ड केनिंग की समझ में आ गया। विद्रोह के प्रारंभ में सिख लोगों की राजनिष्ठा के कारण बनारस और इलाहाबाद शहर अंग्रेजों के हाथ में आ जाने से वे स्वतंत्रता का मुंह बांधकर हिंदुस्थान का गला दबा सके थे; अंग्रेजों के हाथ आया 1857 का स्वातंत्र्य समर - 335 151 1. मैलसन कृत-'इंडियन म्यूटिनी', खंड 4, पृष्ठ 321 ।
अवसर कहीं अब कुंवर सिंह छीन तो नहीं लेगा, इस चिंता से लॉर्ड केनिंग ने तत्काल आदेश दिया कि इस विद्रोही पर स्वयं लॉर्ड मार्ककेर ही आक्रमण करें। क्रीमिया युद्ध में ख्यातिप्राप्त और हिंदुस्थान का पूरा अनुभवी यह लॉर्ड मार्क केर लगभग चार सौ योद्धाओं और तोपों के साथ कूच करता आजमगढ़ से आठ मील दूर आकर ठहरा। कुछ विश्राम कर 6 अप्रैल को भोर ही उसने सावधानी से आगे कदम बढ़ाया। सुबह छह बजे उसे समाचार मिला कि पास ही कुंवर सिंह की सेना उसकी ताक में है। लॉर्ड मार्क केर ने 'ताक' की उसको कोई जानकारी नहीं है, ऐसा स्वांग कर सेना को सज्जित करके कुछ आगे बढ़ाया और तुरंत ही कुंवर सिंह के दांए बाजू पर हल्ला किया। तभी कुंवर सिंह का बायां बाजू गोलियों की बौछार कर उठा। वह वृद्ध युवा एक सफेद घोड़े पर बैठकर अपनी सेना में पितामह भीष्म की तरह चमक रहा था। अंतर इतना ही था कि तब भीष्म दुर्योधन की ओर से लड़ रहे थे और अब यह वृद्ध युवा धर्मराज की ओर से लड़ रहा था। वह स्वातंत्र्य-धर्म हेतु, देश-धर्म हेतु लड़ रहा था। उसकी सेना चार हजार के लगभग थी। परंतु उसमें संख्या के अनुपात में बल नहीं है, यह वह जानता था और इसलिए आज सारा भार उसके अपने अकेले के पुरुषार्थ पर टिका हुआ है, यह देखकर वह शुभ्र अश्वारूढ़ अस्सी वर्ष का सेनापति अपनी सेना के साथ लड़ने में अपने को झोंके हुए था। वह मार्क केर के इधर-उधर अपनी सेना फैलाते ले गया। मार्क केर की तोपें उस पर जबरदस्त मार कर रही थीं और उन्हें उत्तर देने के लिए उसके पास तोपें ने होते हुए भी उसने मार्क केर की पिछाड़ी अपनी सेना जमा कर ली। अंग्रेज सेनापति की आफत हो गई और उसने अपनी तोपें थोड़ी पीछे ले लीं। यह देखते ही विद्रोही जोर का जयनाद करते हुए आगे बढ़ने लगे। कुंवर सिंह ने बीच में ही अवसर खोजकर अंग्रेजों की पिछाड़ी को कस दिया। अंग्रेजी हाथी पागल होकर इधर-उधर दौड़ने लगे। उसके महावत हाथी के गले से लिपट-लिपटकर अपनी जान बचाते भागने लगे और उसके नौकर जल्दी से रण छोड़कर भाग गए। फिर भी मार्क केर ने धीरज नहीं छोड़ा। उसने सामने की विद्रोहियों की टोलियां विभाजित कर और वहां के घरों पर कब्जा कर सामने का बाजू जीत लिया। लेकिन कुंवर सिंह ने भी अंग्रेजों की पिछाड़ी मारकर जीत ली। अब यह विचित्र लड़ाई बराबर उलटी की पलटी हो गई; क्योंकि प्रारंभ में कुंवर सिंह के सामने अंग्रेजों का मुंह था। लड़ते-लड़ते अब कुंवर सिंह उनके पीछे हो गया, जिससे कुंवर सिंह के मुंह की ओर अंग्रेजों की पीठ हो गई। कुंवर सिंह उनके पीछे हो गया, जिससे कुंवर सिंह के मुंह की ओर अंग्रेजों की पीठ हो गई। कुंवर सिंह ने उनकी पीठ को आग लगा दी। अपनी पिछाड़ी की रसद में विद्रोहियों द्वारा लगाई आग देखकर लॉर्ड मार्क केर ने यद्यपि धैर्य नहीं छोड़ा तथापि रणांगण छोड़ने का निश्चय किया। पूरी विजय प्राप्त नहीं हो रही थी तब भी मार्क के रण छोड़ लड़ते-लड़ते निकला और 1857 का स्वातंत्र्य समर – 336
अपनी तोपों की सहायता से रात में उस शहर में आ गया। कुंवर सिंह के इस रण-तांडव के संबंध में प्रख्यात इतिहास लेखक मैलसन कहता है-"उसकी मुहिम का नक्शा प्रशंसनीय था, परंतु उस नक्शे के अनुसार व्यवहार करने में उसने काफी गलतियां की थीं। मिलसन जब उसके हाथ आ गया तब उसका पिछला रास्ता रोकना छोड़ कुंवर सिंह ने उसके मुंह पर मारा। उसका पीछा कर उसे आजमगढ़ में बंद करने पर कुछ सेना आजमगढ़ में रखकर शेष लोगों के साथ कुंवर सिंह यदि बनारस पर तत्काल आ जाता तो लॉर्ड मार्क केर से इससे भी जबरदस्त लड़ाई वह लड़ लेता। वास्तविकता देखें तो वे सारे अवसर उस कुंवर सिंह जैसे योग्य पुरूष के ध्यान में आए बिना न रहे होंगे, परंतु वह परिस्थिति से बंधा हुआ था। जिस-जिस छोटे नायक ने अपने लोग उसके झंडे के अधीन लड़ने के लिए भेजे थे उसमें से हर एक की अपनी-अपनी बुद्धि थी-ऐसे अनेक बुद्धिमानों की बेलगाम बहसों का निर्णय मिश्रित जोड़-तोड़ में ही करना होता है ˙ ˙ ।" लॉर्ड मार्क केर आजमगढ़ में घुसकर वहां की अंग्रेजी सेना में मिल गया तब भी कुंवर सिंह का आजमगढ़ पर कसाव कम नहीं हुआ। वह सारा शहर विद्रोहियों के ही नियंत्रण में था और उसके आसपास के क्षेत्र में उनकी निगरानी भी थी। अपनी सेना का वास्तविक बल कितना है, यह तत्काल जानने की कला भी सेनानी को अवश्य होनी चाहिए और इस कला में यदि कोई सेनानी अति चतुरता दिखाता हो तो वह कुंवर सिंह था। उसने शत्रु का बल जैसे तौला हुआ था उसी अचूकता से उसने अपनी सेना के गुण-दुर्गुण भी माप रख थे। अतः अंग्रेजों के परकोटे या अंग्रेजों पर हमला करने के चक्कर में वह पड़ा ही नहीं। अंग्रेजी परकोटे या अंग्रेजी बैनेटों पर आक्रमण करना छोड़ कोई भी दुष्कर कृत्य करने में सिपाही आगे रहते हैं, कुंवर सिंह यह लखनऊ के उदाहरण से जान गया था। इसलिए आजमगढ़ शहर को नियंत्रण में रखकर और वहां के अंग्रेजों को मुंह बाहर निकलना असंभव बना वह अपने मन में एक दूसरा ही साहसी दांव बनाने लगा। सन् 1857 में रण-मैदान में उतरे हजारों योद्धाओं में हमेशा दो वर्ग दिखाई देते थे। एक स्वतंत्रता के तेज के दिव्य उत्साह को शोभा दे, ऐसे, सीने से सीना टकरा जाए तब भी अटल समर करनेवाले और दूसरे अनुशासनहीन, हौंसला छोड़ देने वाले। कुंवर ने अपनी सेना में से पहले क्रम के प्राण पर प्राण देनेवाले ऐसे कड़े लोग चुनकर उनका एक विशेष पथक बनाया। सन् 1857 में अन्य किसी भी सेनानी द्वारा प्रयोग नहीं की हुई युक्ति सिद्ध करते ही कुंवर सिंह ने ऊपर बताई अपनी साहसी योजना को प्रत्यक्ष रूप देते को कमर कसी और आजमगढ़ के पास की नदी पर अपनी यह चुनी हुई सैनिक टुकड़ी खड़ी कर दी। इस पुल के सामने से सर ल्यूगार्ड नामक एक जनरल सबल अंग्रेजी सेना के 1857 का स्वातंत्र्य समर - 337
साथ आजमगढ़ पर चढ़ा आ रहा था। इस जनरल को लगा कि आजमगढ़ का कब्जा न छोड़ना पड़े, इसी हेतु से कुंवर सिंह कीसेना उस पुल पर मुझे रोके खड़ी है। "अंग्रेज जनरल ही नहीं, उसके निकट के लोगों को भी उस षड्यंत्रकारी राजपूत के मन में क्या दांव चल रहा है, यह समझ में नहीं आ रहा था।”152 वह दांव था अंग्रेजों को वहीं उलझाकर अपनी सेना के साथ तुरंत जगदीशपुर चले जाना। यह युक्ति, युद्ध-कौशल और युद्ध धैर्य का उत्कर्ष थी। आजमगढ़ा से गाजीपुर पहुंचकर वहां से गंगा नदी का पाट सेना सहित उतरकर जगदीशपुर जीतना और वह भी पीछे ल्यूगार्ड की अंग्रेजी सेना और आगे आरा की अंग्रेजी सेना-इन दोनों को चकमा देकर! इस साहसी योजना को सिद्ध करने के लिए उस पुल पर उस राजपूत ने अपने अति उत्तम लोग रखे थे। उस सेना को उस पुल पर ल्यूगार्ड को इतनी देर तक ठहराना था कि आजमगढ़ के सात-आठ हजार क्रांतिकारी सैनिक उस शहर का चक्कर काटकर वह शहर पीछे छोड़, सीधे गाजीपुर के रास्ते पर सकुशल लग सकें। गंगा उतरकर एक बार जगदीशपुर के वन में जगदीशपुर का सिंह घुस जाए तो रणक्रीड़ा की नई पहल, नवराज्य का नया प्रारंभ हो जाए। यह सारा साहसी प्रयास सिद्ध होना, इस तानू नदी के पुल पर के हे सैनिकों! पूरी तरह तुम्हारी शूरता पर अवलंबित है! कुंवर सिंह का सारी सेना आजमगढ़ छोड़कर शत्रु के निशाने से पूरी तरह बाहर निकलने तक तुम इस पुल पर सर ल्यूगार्ड को पैर मत रखने देना। इस अटल समर के लिए तुम ही योग्य हो, इसलिए हजारों योद्धाओं में से तुम्हारे उस नायक ने तुम्हारा चुनाव किया है। उसके विश्वास को तुम्हारी शूरता सत्पात्रता दिलवाएं एक विचार, एक संकल्प, एक प्रतिज्ञा है कि आजमगढ़ के हजारों बंधु पार निकल गए होने का संकेत मिलने के पूर्व यह पुल छोड़ना नहीं है। अंग्रेजों जैसी सबल सेना तोपों के साथ आगे ीिड़ी है तब भी पुल छोड़ना नहीं है। सारे-के-सारे मर जाने तक पुल छोड़ना नहीं है। कुंवर लड़ते-लड़ते मर जाएं, फिर भी पुल नहीं छोड़ना। "पुनर्जन्म लेकर फिर लड़ना!” श्री शिवराज किले तक पहुंचने के पूर्व बाजी देशपांडे पावन घाटी में जैसे लड़ा वैसे स्वदेश की अतुल पांडेगिरी स्वराज्य की इस बाजी के लिए आज इस पुल को भी पावन करो। अफजल खां की सेना ने जैसे उस इतिहास-प्रसिद्ध घाटी के मुट्ठी भर मराठों पर हमले क बाद हमले किए वैसे ही इस पुल के ऊपर कुंवर सिंह की छोटी सी सेना पर ब्रिटिश सेनानी ल्यूगार्ड भी हमले-पर-हमले करता रहा। पर उस पुल पर उसका पांव न टिक पाता। मानो हमले की हर गेंद पांडे पक्ष द्वारा रोकी जाने पर उतने ही वेग से वापस लौट जाती हो। आजमगढ़ के सारे विद्रोही गाजीपुर के रास्ते पर निकल चुकने का संकेत आने तक वह स्देशाभिमानी पुल ऐसे प्रतिहत बल से लड़ता रहा। मैलसन लिखता है-'रण में धैर्य रखनेवाले वीरों के 1857 का स्वातंत्र्य समर – 338 152 1. मैलसन, खंड 4, पृष्ठ 330 ।
समान उन वीरों ने नावों के इस पुल की रक्षा बड़े उत्साह से की और उनके साथ सुरक्षित स्थान में पहुंचने के लंबे समय तक का प्रतिकार कर हट गए''153 जगदीशपुर का मालिक अपनी सेना के साथ आजमगढ़ से सकुशल पार हो गया है। पांडे सेना ने अपने आप ही अकस्मात् पुल छोड़ दिया है, यह देखते ही ल्यूगार्ड उसपर घुसने लगा। तब उसके ध्यान में आया कि कुंवर सिंह या उसकी सेना भी किसी जादूगर की निर्मिति जैसी आजमगढ़ से क्षण में गायब हो चुकी है। निराश हुए उस अंग्रेज सेनानी ने घोड़े पर के तोपखाने सहित घुड़सवारों को कुंवर सिंह का पीछा करने भेज दिया। बारह मील तक अंग्रेजी घोड़े दौड़े, फिर भी कुंवर सिंह नहीं दिखा और जब वह दिखा तब भागनेवाले कौन और पीछा करनेवाले कौन, यह रणक्षेत्र में जान पाना कठिन हो गया। अंग्रेजी सेना को देखते ही विद्रोही सिटपिटाए नहीं बल्कि विद्रोहियों को देखकर अंग्रेजी`सेना ही सिटपिटा गई । कुंवर सिंह की सेना ठाट से खड़ी होकर अपनी तलवारें निकाल, बंदूकों से निशाना साध, गुस्से से आगबबूला होते और तिरस्कार से गालियां देते बुलाने लगे, "आ जा फिरंगी, आ आगे! हो जाए दो-दो हाथ!" और फिरंगी के आगे आते ही विद्रोहियों ने ऐसे दो हाथ किए कि अंग्रेजों कितने ही योद्धा और अधिकारी धराशायी हो गए। विद्रोहियों के सिपाही अचल-अभंग रहे। अंग्रेजों को अपना बचाव करना कठिन हो गया और कुंवर सिंह अपनी सेना के साथ गंगा के अधिक ही निकट आ गया। अंग्रेजों द्वारा पीछा किए जाने का यह दरिद्री समाचार शवों के साथ आजमगढ़ पहुंचते ही वहां से पांच-दस तोपों के साथ नई अंग्रेजी सेना लेकर डगलस उस पीछा करनेवाली टुकड़ी से जा मिला। इस डगलस ने कुछ ही समय पूर्व आजमगढ़ में कुंवर की तलवार का पानी चखा था। कुंवर के उस थप्पड़ को न भूला यह अंग्रेज सेनानी बड़ी सावधानी से उसका पीछा करते नघई गांव तक आया। वहां कुंवर सिंह उसकी राह देखता खड़ा ही था। अंग्रेजी सेना दिखते ही अपनी शूरतम सेना की टुकड़ी कुंवर सिंह ने उनसे भिड़ने आगे बढ़ाई और आदेश दिया कि शत्रु का बहादुरी से सामना करो। तुरंत शेष सेना के दो भाग कर उन्हें कुंवर ने अलग-अलग रास्ते से आगे कूच करने भेज दिया। वे उधर जा रह हैं तब तक अंग्रेजों से उन मुट्ठी भर वीरों ने घमासान चलाए रखी, शत्रु की भयानक तोपों का जवाब ऐसा कोई उत्तम साधन पास न होने से उनके साथी चटपट मरते रहे, पर वे तिल भर भी नहीं डिगे। न उनकी पंक्तियां ढीली हुई, न उनका अनुशासन बिगड़ा और न ही एक भी कदम बिना युद्ध-कौशल के रण में अटका। चार मील तक यह भयंकर लड़ाई चलती रही। अंत में अंग्रेजी सेना थक गई है, यह उसके लड़खड़ाते कदमों से दिखाई देते ही अलग-अलग रास्ते से चल रहे सेना के 1857 का स्वातंत्र्य समर - 339 153 1. मैलसन, खंड 4, पृष्ठ 330 ।
दो विभाग तुरंत इकट्ठा हो गए और अपनी पूरी सेना सहित कुंवर सिंह गंगा घाट के अधिक ही पास आ गया। अप्रैल की 17 तारीख को यह थकी हुई अंग्रेजी सेना अथुसिरवा गांग में सो गई। भोर होने पर जब डगलस आगे बढ़ा तो उसने देखा, विद्रोही उससे सत्रह मील आगे है। अतः वह सारा दिन अंग्रेजी घोड़े और तोपखाना विद्रोहियों की खोज में दौड़ता रहा। पर अंग्रेजी पैदल बहुत पीछे पड़ता रहा। तब कुंवर सिंह से चार मील पहले अंग्रेजी सेना एक नींद लेने लग गई। कुंवर के जासूस शत्रु की बात उड़ाने में अति कुशल थे। उन्होंने अंग्रेजों के सौ जाने का समाचार तत्काल कुंवर सिंह को दिया और कुंवर उठा-उसने शत्रु की नींद का लाभ लेने का निश्चय किया। वह अस्सी वर्ष का वृद्ध राजपूत अपनी सारी सेना के साथ उस आधी रात के अंधेरे में तुरंत निकला और सिंकदरपुर आ गया। घाघरा नहीं उतरा, गाजीपुर प्रदेश में घुसा और सीधे मनोहर शहर तक दौड़कर आया और अपनी थकी हुई, पस्त हुई भूखी सेना को कुछ विश्राम देने थोड़ा ठहर गया। कुंवर की सेना अब बहुत ही थक गई थी। मनोहर गांव का स्थान बहुत मजबूत न होते हुए भी उन्हें विश्राम के लिए ठहरना ही पड़ा। इस गांव में विद्रोही आगे जाना असंभव होने से ठहरे हुए हैं, यह सुनते ही डगलस दौड़ने लगा और 20 अप्रैल को मनोहर गांव आ पहुंचा। उस दिन उन थके हुए विद्रोहियों का जोर कम पड़ा और अंग्रेजी सेना ने उन्हें पराजित कर उनकी गाड़ियां-रसद छीन लीं। परंतु वह वृद्ध युवा या उसका धीरज नही हारा। पराजय का चिह्न देखते ही पहले से ही सोचा-समझा आदेश जारी हुआ। कुंवर की सेना पलक झपकते ही छोटी-छोटी टुकड़ियों में बंटकर रणक्षेत्र से तत्काल एक निश्चित समय पर निश्चित स्थान पर एकत्र होने हेतु अदृश्य हो गई। अंग्रेजी सेना इस संबंध में कुछ भी जान न सकी और अपनी विजय निष्फल देख वहीं ठह गई। कुंवर सिंह अपनी सेना के साथ गंगा पाट के बहुत नजदीक हो गया। वह गंगा के पाट के अधिकाधिक पास आ गया। भयानक स्पर्धा जीतकर गंगा पाट से भिड़ भ गया! पीछे अंग्रेजीसेना दौड़ती आ रही थी; परंतु उसका सामना करने की शक्ति या समय अब शेष नहीं था, इसलिए उस चतुर वृद्ध ने एक अलग ही युक्ति भिड़ाई। उसने यह अफवाह फैला दी कि नौका न मिलने से कुंवर सिंह की सेना हाथियों से बाल्टिला के पास गंगा पार होने वाली है। यह समाचार अंग्रेजी जासूसों द्वारा पकड़कर डगलस को सूचित करते ही वह प्रसन्नतापूर्वक अपने जासूसों पर गर्व करने लगा। अब कुंवर सिंह कहां जाएगा? उसका यह गुप्त समाचार मिल जाने से मैं उसके हाथी सहित नष्ट कर दूंगा। इसलिए अंग्रेजी सेना बाल्टिला के पास जाकर उस भारी हाथी की राह देखती रही। ओ शूरवीर ! मजे से छिपकर बैठो। तुम्हारी इस स्वनिर्मित कैद में तुम अटके पड़े हो और कुंवर सिंह का हाथी अब फिर आएगा, इसलिए तब तक नींद निकाल 1857 का स्वातंत्र्य समर — 340
रहे हो, इसी समय सात मील दूर कुंवर सिंह गंगा उतरकर जा रहा था। हाथियों से गंगा पार करने के समाचार से बाल्टिला की ओर उन्हें भेजकर कुंवर ने उतनी नौकाएं तुरंत इकट्ठा कीं और रात-ही-रात में उसकी सेना मेयो घाट से श्री गंगा के जलाशय में प्रवेश कर गई। अंग्रेजों को उनके साथ किया गया धोखा ध्यान में आते ही वे भोर के समय सैदोपुर घाट पर गुस्से से भरे टूट पड़े और उन्होंने पांडे लोगों की एक नौका भी डुबो दी; पर वह अंतिम नौका थी। सारी सेना कुंवर सिंह ने पहले ही गंगा पार उतार दी थी और क्षण-दो क्षण में अपनी सेना को सुरक्षित नदी पार हुआ देखकर वह भी पार हो गया होता; परंतु हाय! हाय! अभिमान, स्वतंत्रता की वह तलवार-राणा कुंवर सिंह! गंगा पाट ममें बीचोबीच पहुंच गया तब शत्रु की एक गोली आई और उसके हाथ में घुस गई। यह देखते ही उस भीष्म ने क्या किया? अश्रु बहाने लगा क्या? रक्त का बहाव रोकने के लिए किसी से सहायता मांगने लगा क्या? क्या उसका आसन उस तीव्र वेदना से किंचित् भी विचलित हुआ? नहीं-नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। हाथ पर मक्खी बैठे, उतना भी कंपित नहीं हुआ। उसने एक बार उस गोली की ओर तिरस्कार से देखा और कुंवर सिंह को मैंने एक क्षण भी अस्वस्थ किया, उस फिरंगी गोली को यह अभिमान भी न हो-ऐसा उसे लगा। उसने दूसरे हाथ से अपनी तलवार खींच ली और फिरंगी गोली से भ्रष्ट हुआ हाथ कुहनी से छांट दिया और वह काटा हुआ टुकड़ा गंगा को अर्पण करते हुए कुंवर सिंह ने गंभीर गर्जना की-हे माता, हे गंगा! बालक का यह शेषोपहार स्वीकार करें!154 भागीरथी को हे माता, हे माता कहनेवाले सैंकड़ों पृथजन आज तक जनमे और जनमेंगे, पर कुंवर सिंह, तेरे कारण वह देवी जाह्नवी पुत्रवती हुई है! 'नक्षत्रतारागृहसंकुलापि ज्योतिष्मती चंद्रमसैव रात्रिः!' इस लोकोत्तर पुरुष द्वारा यह अलौकिक उपहार अपनी त्रिलोक विख्यात मातृगंगा को अर्पित करते ही उसकी शीतल फुहारों ने उसका देह सिंचन किया और इस मातृप्रेम से उत्साहित वह वीरवर अपनी सेना के साथ गंगा पार हो गया। उसका पीछा करती अंग्रेजी सेना हताश होकर गंगा के इस ओर ही कुंवर सिंह का नाम लेना छोड़ऋकर बैठी हुई थी । तब वैर भाव से रहित हुआ वह सिंह शाहाबाद प्रांत के अपने जन्मसिद्ध जंगल में फिर एक बार घुसने लगा। 22 अप्रैल को उसने जगदीशपुर में भी प्रवेश किया और इस तरह जिस राजमंदिर से उसे कोई आठ माह पूर्व अंग्रेजों ने निकाल दिया था उसी जगदीशपुर के राजमहल में उसका अपना राजा फिर एक बार विराजने लगा। कुंवर सिंह के गंगा उतरकर आते ही उसका समान वीर बंधु अमर सिंह हजारों सशस्त्र ग्रामीणों के साथ उसे आकर मिल गया। इन लोगों को और गंगा उतरकर आए शूर 1857 का स्वातंत्र्य समर – 341 154 1. रजनीकांत गुप्त कृत 'आर्य कीर्ति', बंगाल।
सिपाहियों को कुंवर सिंह ने जगदीशपुर के चारों ओर के जंगल में निशाने-निशाने पर नियुक्त किया और छापामार युद्ध से विजयश्री माया हुआ वह वीर रणपुरूष रण के लिए सज्जित होकर फिर से रण में उतरा। और फिर युद्ध शुरू हुआ। कुंवर सिंह इतनी तेजी से जगदीशपुर में आ घुसा था कि पास में ही आरा की अंग्रेजी सेना को उसके आगमन की सूचना नहीं मिली। तब जगदीशपुर के राजमहल में कुंवर सिंह फिर से आ धमका है, यह सुनकर आरा का अंग्रेज सेनानी ली ग्रांड गुस्से से आगबबूला हो गया । पूर्व अवध से अंग्रेजी सेना को थप्पड़ मारते-मारते यह कुंवर गंगा उतर आया और खुद मेरे सीने पर से चलकर जगदीशपुर में राज्य करने लगा। पूरे आठ माह नहीं हुए जब होअर इसी जंगल में कुंवर को नरम करने घुसा था। वैसे ही आज मैं भी घुसूंगा और इस सारे अपमान का बदला लेकर वैसी ही विजय भी प्राप्त करूंगा। यह निश्चय कर वह अंग्रेज सेनानी चार सौ सैनिक और दो भयंकर तोपें लेकर 23 अप्रैल को जगदीशपुर पर टूट पड़ा। अब इस युद्ध में कुंवर सिंह कैसे टिका रहे? वह आज तक लगातार लड़ते-लड़ते खड़ा हुआ है, उसकी सेना को कितने ही दिन भरपेट खाने को और घड़ी भर सोने को समय नहीं मिला! कल ही वह इस महायात्रा के बाद जगदीशपुर के राजमहल में आया-उसे और उसकी सेना को एक दिन की भी फुरसत नहीं मिली-उसकी सेना भी इस समय अंग्रेजों की रिपोर्ट के अनुसार-‘उसकी सेना बेतरतीब बिखरी हुई, शस्त्र, अस्त्र, तोपें आदि युद्ध सामग्री से अपूर्ण पंगु-सी बन गई थी।‘' उनके पस एक भी बंदूक नहीं, उनके हताश लोगों की संख्या खींच-तानकर डेढ़ हजार, उनके पास टूटे-मुड़े शस्त्र, उनमें शिक्षित सिपाही नहीं के बराबर और स्वयं उस वृद्ध सेनानी का हाथ कल ही कटा था। पांडे लोगों की ऐसी सेना पर तोपों के साथ, ताजा दम उत्तम शिक्षित आंग्ल सेना के साथ ली ग्रांड का आक्रमण। इस असमान लड़ाई में विजय अंग्रेजों की होगी, यह निश्चित था! वह अंग्रेज बहादुर जगदीशपुर की घनी झाड़ियों में घुस गया। इन झाड़ियों की लंबाई डेढ़ मील ही थी। झाड़ी में घुसते ही कुंवर सिंह के लोगों पर अंग्रेजी सेना गुराते हुए गोले छोड़ने लगी। कुंवर के पास तो तोपें थी ही नहीं, पर ऐसा होते हुए भी कुंवर की सेना अंग्रेजी सेना की तोपों की खिल्ली उड़ाते हुए उसे घेरकर बांधना चाहती थी। फिर अब छोड़ें अंतिम बाण! अंग्रेजी सेना ने जोरदार हमला करने का निश्चय किया। वे कालदूत की तरह कुंवर पर टूट पड़े, कुंवर की सेना झाड़ियों में से उनका सामना करने लगी। अरे! अंग्रेजी सेना की हिम्मत एकदम टूट गई, पीछे लौटने का बिगुल बज उठा। कुंवर ने अंग्रेजी सेना को ऐसी जगह और इस रीति से फांस लिया था कि वहां खड़ा रहना या वहां से भागना-ये दोनों ही समान रूप से घातक थे। इधर कुंवर सिंह के आदेश से उसके राजमहल का सारा महत्त्वपूर्ण सामान दूसरी जगह भेज दिया गया था। वैसे ही सरकारी 1857 का स्वातंत्र्य समर - 342
कागज आदि न जलाकर उसने सिपाहियों को कहा कि अंग्रेजों को यहां से भगा देने के बाद वास्तविक वसूली और न्याय करने के लिए ये कागज अवश्य रखे जाने चाहिए। लोगों का उसके प्रति इतना आदर था कि उसके सामने कोई धूम्रपान करने की हिम्मत नहीं करता था।¹⁵⁵ 23 अप्रैल को अंग्रेजी सेना को ऐसी धोबी पछाड़ देकर उस वृद्ध युवा राजा कुंवर सिंह ने अपने जगदीशपुर के राजमहल में विजयश्री के साथ प्रवेश किया। यह उसका अंतिम प्रवेश था, क्योंकि विश्व की रंगभूमि पर अब कुंवर सिंह फिर से प्रकट नहीं होगा। उसके हाथ में गंगा पार में जो भयानक घाव हुआ थ वह बहुत बढ़ जाने के कारण वह राजपूत कुलकीर्ति राजा कुंवर सिंह इस विजय के तीसरे दिन 23 अप्रैल को अपने पूर्वजों द्वारा अर्जित राजमहल में स्वतंत्रता के झंडे के नीचे चिन्मय रूप में लीन हो गया। जब उसका जन्म हुआ था तब उसकी भूमि स्वतंत्र थी और उसका प्राणोत्सर्ग भी स्वतंत्रता के झंडे के नीचे हुआ। जिस दिन वह मरा उस दिन जगदीशपुर के रजवाड़े पर अंग्रेजों का निशान नहीं, उसके स्वदेश एवं स्वधर्म का स्वातंत्र्य थी और उसका प्राणोत्सर्ग भी स्वतंत्रता के झंडे के नीचे हुआ। जिस दिन वह मरा उस दिन जगदीशपुर के रजवाड़े पर अंग्रेजों का निशान नहीं, उसके स्वदेश एवं स्वधर्म का स्वातंत्र्य ध्वज फहरा रहा था। राजपूत के लिए इससे अधिक पुण्यतर मृत्यु कौन सी हो सकती है! उसने अपने अपमान का प्रतिशोध लिया। उसने रणांगण में अत्यल्प साधनों से अंग्रेजी सेना जैसे प्रबल शत्रु के अनेक बार दांत खट्टे किए थे। उसने स्वधर्म से धर्मद्रोह या स्वदेश से देशद्रोह नहीं किया। उसने अपनी भूमि की दास्य श्रृंखला तोड़कर उसे स्वतंत्र किया और युद्ध में आज अस्सी वर्ष के उस वृद्ध कुंवर सिंह का विजयश्री ने अलौकिक आलिंगन किया हुआ है, तो हे सिंह कुमार! यही वह मुहूर्त है और यही वह वेला, हे धर्मपक्षीय भीष्म! यही उत्तरायण है-इसलिए तू अपने वीर तन का त्याग कर! और वह भी रोग से नहीं, युद्ध के घावों से! जैसा तेरा जीवन लोकोत्तर वैसी ही तेरी मृत्यु भी! इसीलिए वह कुंवर सिंह उस दिन मरा। राजपूत के लिए इससे अधिक पुण्यतर मृत्यु कौन सी हो सकती है! श्री कुंवर सिंह की भूमिका किसी वीर काव्य के नायक स्थान पर शोभित हो सकती है। सन् 1857 के क्रांतियुद्ध में यदि कोई सब प्रकार से योग्य नेता था तो वह कुंवर सिंह ही था। युद्धकला में उसकी बराबरी कर सके, ऐसा कोई नहीं था। स्वातंत्र्य युद्ध में कूट युद्ध का कितना महत्त्व होता है, यह सबसे पहले कुंवर ने पहचाना और शिवाजी के कूट युद्ध का सही-सही नकल कैसे की जाए, उसी अकेले ने सिद्ध किया। तात्या टोपे और कुंवर सिंह के युद्ध चातुर्य की तुलना करें तो कुंवर की कूट पद्धति ही अधिक बेतोड़ थी, ऐसा दिखाई देता है। तात्या ने कूट युद्ध की काट करने में अधिक चतुराई प्रकट की। परंतु कुंवर ने निषेध जैसी ही विधि रूप में भी कूट युद्ध की पूर्णता 1857 का स्वातंत्र्य समर – 343
155 1. रजनीकांत गुप्त कृत 'आर्य कीर्ति', बंगाल।
सिद्ध कर दी। तात्या ने सैनिकों का नाश नहीं होने दिया; परंतु कुंवर ने तो उसके अतिरिक्त शत्रु सेना का यथावसर नाश भी किया। कूट युद्ध में पूर्ण विजय पाने के लिए यह सावधानी रखनी होती है कि बड़े शत्रु के आगे से भागते समय उस पराजय से अपनी सेना हताश या भयग्रस्त न हो। जान-बूझकर स्वीकारी हुई पराजय से उनकी आत्मनिष्ठा दुर्बल न हो और लड़ाई की बार-बार टाला-टूली से लड़ाई के संबंध में उनके मन में कोई स्थायी भय न समा जाए-इसके लिए छापामार युद्ध का सेनानी हमेशा सतर्क रहे। लड़ाई टालना अलग बात है और लड़ाई लड़ते हुए भीरुता के कारण पराजित होकर पीछे हटना अलगा बात। अर्थात् कूट युद्ध में भीरुता के कारण पराजित होकर कभी पीछे नहीं हटना चाहिए। लड़ाई लड़नी ही पड़े तो ऐसी लड़ें कि शत्रु के मन में अपनी शूरता का भयंकर भय उत्पन्न हो जाए और अपनी सेना आत्मनिष्ठा की स्फूर्ति से भर जाए। सेनानी की मुख्य खूबी यही होनी चाहिए कि अधिक हानि की आशंका की स्थिति मेमं वह सामना टालता जाए। पर जब सामना हो ही जाए तो ऐसी शूरता प्रदर्शित करे कि जैसी बाजी प्रभु ने पावन घाटी में या कुंवर ने तानू नदी के पुल पर दिखाई। सारांश यह कि लाभ में न हो तो लड़ाई टाले, लाभकारी हो तो लड़ाई लड़े, परंतु कभी भी रण में भय या अनुशासनहीनता से अपनी बदनामी न करवाए। शूरता से ऐसी लड़ाई लड़े कि रण में पराजय हो तो भी विश्व में सत्कीर्ति बढ़े। इससे शत्रु डर जाता है, अपनी सेना में अनीति नहीं बढ़ती, अनुशासन नहीं छूटता, उत्साह बढ़ने लगता है, शूरता का उत्कर्ष होता है, विजय पक्की होती है। शत्रु ने हमें शूरता से जीता है, ऐसा कभी न होने देना ही कूट युद्ध की कुंजी है। तात्या टोपे ने छापामार युद्ध के विधिरूप का अवलंबन अधिक बार नहीं किया था। जब वे नर्मदा उतरे और जब कुंवर सिंह गंगा उतरे तब दोनों के युद्ध-कौशल में क्या अंतर था, यह स्पष्ट दिखता है। तात्या टोपे की सेना को डर के कारण बार-बार पराजय स्वीकार करनी पड़ी। परंतु कुंवर ने पीछे हटते हुए भी शत्रु अपनी शूरता की डींग हांके, ऐसी स्थिति नहीं बनने दी और जब-जब अवसर मिला तब-तब शत्रु को ऐसा झापड़ लगाया कि रण में उसकी सेना में अधिक आत्मनिष्ठा और वीरस्फूर्ति बनी रहती। तात्या अधिकतर अपनी इच्छा के अनुसार चल नहीं पाते होंगे और इसलिए उनको जो चाहिए था उस परिस्थिति में वे उतना नहीं कर पाते थे; पर कुंवर सिंह ने छापामार युद्ध लड़ते हुए शिवभूप की तरह ही सेना में कातरता और अनीति नहीं घुसने दी और लड़ाई टालना और लड़ाई करना-इस विधि-निषेध से वक्र युद्ध के दोनों ही अंगों का खेल करने में अप्रतिम युद्ध-कौशल दिखाया। इसीलिए वह अंग्रेजी सेना के सीने पर तांडव करते-करते पवित्र विजयानंद में, अपने राजभवन में, स्वतंत्रता के झंडे तले और देवदूतों के पंखों के नीचे पुण्य पावन मृत्यु प्राप्त कर सके। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 344
सन् 1857 की 26 अप्रैल को इस दिव्य पुरूष के देवलोक जाते ही उसके सिद्धांतों का, उसके ध्येय का, उसकी सेना का और उसके ध्वज का सारा भार अपने सिर लेकर कुंवर सिंह का कनिष्ठ बंधु अमर सिंह गद्दी पर बैठा। कुंवर सिंह का यह कनिष्ठ बंधु अमर सिंह, एक ही सिंहनी की गर्भगुहा से संभव हुए थे, वे दो केसरी किशोर अपने प्रखर नखों की तीक्ष्णता में परस्पर तुल्य थे। भाई की मृत्यु के कारण इस लड़ाई में जरा भी ढील न देकर पूरे चार दिन भी विश्राम न करते हुए यह रणपंडित अमर सिंह भी आरा शहर का दरवाजा ठोकने लगा। ली ग्रांड की पराजय सुनकर पीछे गंगा किनारे ही खड़ा ल्यूगार्ड व ब्रिगेडियर डगलस दोनों अपनी-अपनी सेना के साथ अमर सिंह पर 3 मई को चढ़ आए। मिहिया, हंतमपुरा, दलितपुरा में विद्रोहियों पर हर दो-तीन दिन बाद अंग्रेज गोलीबारी करते। जगदीशपुर भी अंग्रेजों ने अपने कब्जे में ले लिया। उस सबल सेना के पंजे से छूटने तथा पराभव टालने को अमर सिंह ने एक अप्रतिम युक्ति खोज ली थी। उसने रणक्षेत्र में अपनी सेना की छोटी-छोटी टोलियां बनाईं और पराजय का रंग दिखते ही वे टोलियां शीघ्र ही इधर-उधर हो जाती। उस प्रदेश के इंच-इंच की जानकारी उन्हें होने से नियत समय पर सारी टोलियां नियत स्थान पर इकट्ठा होतीं और फिर से अंग्रेजों को बिलकुल दिखती ही नहीं थी। किसी भूत-प्रेत की तरह उस सारे प्रदेश में अंग्रेजी सत्ता के कण-कण को पछाड़ते हुए भी अमर सिंह उन्हें प्रत्यक्ष कहीं नहीं दिख रहा था। एक टोली राजपुर होती, दूसरी दमरान तो तीसरी कर्मनाशा पर बने रेल कारखाने धूल में मिला देती। जंगल के इस छोर से अमर सिंह को निकालें तो वह जंगल का दूसरा छोर जीत लेता, जंगल के उस छोर की ओर अंग्रेजी सेना दौड़ती तो इस छोर पर अमर सिंह फिर राज्य करने लगता। शाहाबाद प्रदेश के समस्त लोकसमूह की सहानुभूति और सहकर मिलते रहने से अमर सिंह के साथ रण का खेल-खेलते हुए ल्यूगार्ड और उसकी विशाल सेना की हड्डियां नरम पड़ गईं। 15 जून को वह निराश-हताश अंग्रेज सेनापति इस्तीफा देकर इंग्लैंड चला गया और उसकी थकी हुई सेना आराम करने छावनी में चली गई। यह देखते ही सारी छोटी-छोटी टोलियां एकत्र हो गईं और जगदीशपुर का राजा अमर सिंह और उसकी सेना रण-मैदान में फिर से प्रकट हो गई। उस विजय आवेश से भरी उस सेना ने गया में कैद सारे विद्रोहियों को वहां की अंग्रेजी पुलिस से मुक्त कराया और इस तरह गया शहर स्वतंत्र हो गया और आरा की अंग्रेजी सेना को युक्ति से शहर के बाहर बुलवाकर उसपर अमर सिंह का झंडा लगा दिया। इस तरह हर ओर अमर 1857 का स्वातंत्र्य समर - 345
सिंह का कहर बरपा और जुलाई में उसने फिर एक बार जगदीशपुर में प्रवेश किया। जुलाई बीती, अगस्त बीता, सितंबर बीता फिर भी जबदीशपुर में स्वतंत्रता का झंडा हर दिन की सूर्यकिरण में फहराता ही रहा। ब्रिगेडियर डगलस जैसा अंग्रेज सेनानी और सात हजार अंग्रेजी सेना उस छोटे से राजा पर दांत भींचकर टूटते रहे, उसका सिर काटने या उसकी योजना भंग करने का अनेक देशद्रोही भी उसकी सेना में धन का लालच देकर भेजे गए। जंगल में नए रास्ते बनाए गए, नाके-नाके पर अंग्रेजी सेना की पक्की कतार बांधी गई। परंतु कुछ भी करें, जगदीशपुर का राजा परेशान नहीं हा पाया। उसके अनंत दाव-घातों की सारी कथाएं यहां स्थानाभाव के कारण नहीं दी जा सकती । इतना कहना काफी है कि स्वतंत्रता के पुण्य रण में वह वीर अमर सिंह आमरण ऐसे ही पूर्ण साहस से समरांगण में भिड़ा रहा। अंत में उसे जगदीशपुर में ही कैद करके गाढ़ देने के उद्देश्य से अलग-अलग सात अंग्रेजी सेनाएं जगदीशपुर के सारे रास्ते बंद करती हुई चढ़ आईं। प्रदेश भर से सारे विद्रोहियों को इस जाल से भगाते-भगाते 17 अक्तूबर को वह कालपाश जगदीशपुर की सीमा से जा भिड़ा। हाय! हाय! अब इस कालपाश में वह स्वतंत्रता-प्रेमी सिंह पकड़ा जाएगा! नियत समय पर ये सातों बलशाली सेनाएं अचानक जगदीशपुर को घेर लें, उसे कड़ा आदेश जारी हुआ और उस आदेश के अनुसार चारों ओर से बंद उस जगदीशपुर के पिंजड़े के अमर सिंह पर कठोर वार हुआ। पर शाबाश रे अमर सिंह, शाबाश! इस कठोर वार को पिंजड़ा मिला, पर सिंह वहां नहीं मिला तो नहीं मिला! क्योंकि छह सेनाएं छह रास्तों से अचूक आ गईं, फिर भी सातवीं सेना आने में पांच घंटे की देर हो गई और इस विलंब का कुशाग्र अमर सिंह सुशीघ्र लाभ लेकर उसी रास्ते से और उन्हीं पांच घंटों में सेना के साथ फरार हो गया। इस सात डोरियों के जाल की सातवीं डोरी टूटते ही सिंह मुस्कुराता हुआ बाहर निकला और भक्ष्यार्थ लगाया गया वह जाल उसी के नखों में फंसकर पूरी तरह फट गया। अतः अब ऐसे जाल बुनते बैठने की बात भूलकर अंग्रेजों ने चुने हुए घुड़सवारों की एक टोली तैयार की और वह टोली विद्रोहियों का लगातार पीछा करे, यह आदेश दिया। यह अंखड पीछा अमर सिंह की पीठ को लगते ही उसे तनिक भी विश्राम असंभव हो गया। यह अखंड पीछा अमर सिंह की पीठ को लगते ही उसे तनिक भी विश्राम असंभव हो गया। साथ ही अंग्रेजों के पास अब एन्फील्ड राइफल जैसी नई बंदूकें आ गई थी। उनकी मार लंबी थी और उनके सामने विद्रोहियों की मस्कट बंदूके अच्छा काम नहीं कर सकती थीं। 19 अक्तूबर को अंग्रेजों ने एक गांव में पहले क्रांतिकारियों को पीछे से घेरा और उनमें से तीन सौ लो काट डाले। शेष बचे एक सौ लोग एक गांव खेड़े में लड़ते बाहर के खेत में पागल बाघों जैसे घुस गए। परंतु उनको भी अंग्रेजों की नई कुमुक ने घेर 1857 का स्वातंत्र्य समर – 346
लिया और तलवारों से उन्हें भी काट डाला। केवल तीन असामी पास के गन्ने के खेत में छिपे थे, इसलिए बचे। और इन तीन लोगों में ही अमर सिंह भी था। यहां से बचकर अमर सिंह की सेना कैमूर पर्वतों में घुस गई। उसके पीछे-पीछे अंग्रेजी सेना भी घुसी। इसलिए उस वर्तत के हर टीले और हर शिखर पर लड़ाई करते-करते पांडे लोगों की उस स्वातंत्र्य पूतना (पलटन) ने दिसंबर के अंत में रण में रक्त समाधि पाई। इस तरह बिहार प्रदेश के स्वतंत्रता समर की बहार उजड़ गई। फिर भी राजा अमर सिंह शत्रु के हाथ अभी तक नहीं आई। अंतिम वृत्तांत किसी को भी पता न चलने देकर सदेह स्वर्ग गमन की अनुमति कभी भूलोक के मनुष्यों को यदि स्वर्गलोक के देव, गंधर्व देते होंगे तो उस सम्मान के योग्य इस मर्त्य विश्व में केवल अमर सिंह ही था, यह निर्विवाद है।
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प्रकरण-9 मौलवी अहमद शाह लखनऊ की पराजय के बाद अवध एवं रुहेलखंड के विद्रोहियों का अब कोई सबल मुख्य केंद्र नही रहा था। दोआब और बिहार में अंग्रेजों की पुनर्विजय की लहर सामने आते बांध-बंधनों को धक्के-पर-धक्के देती बड़े वेग से आगे ब़ने लगी, इस कारण वहां भी पांडे पक्षीय नेताओं को आश्रय नहीं मिलने वाला था। ऐसी स्थिति में उन्हें विद्रोह के प्रारंभ में जो युद्ध पद्धति सूझी, वह सहज सूझ गई और उसका अवलंबन कर उन्होंने अंग्रेजों से यह तुमुल युद्ध जारी रखने का निश्चय किया; अंतर इतना ही था कि विद्रोह के प्रथम आवेश में यदि आज पराजय से दुर्बल होकर उस रास्ते पर कदम बढ़ाने से अंतिम सफलता तक पहुंचना बहुत दुष्कर हो गया था। तथापि दुष्कर हो, सुकर हो, म्यान से बाहर खींची तलवार समर्पण करके नीचे नहीं रखनी है, इस संकल्प से अवध के विद्रोही नेताओं ने लखनऊ गिरते ही कूटयुद्ध पद्धति स्वीकार करके रुहेलखंड के विद्रोहियों की अलग-अलग टोलियों को यह प्रख्यात आदेश जारी किया- “फिरंगियों की संगठित सेना से आमने-सामने लड़ने का प्रयास न करें; क्योंकि व्यवस्था, अनुशासन और कवायद में वे सेनाएं आपसे श्रेष्ठ हैं और उनके पास बड़ी-बड़ी तोपें हैं। इसलिए उनसे खुले मैदान की लड़ाई न लड़कर छापे मारकर उनके आवागमन को रोकते रहें। नदी के सारे घाट दबाए रहें, उनका आवागमन तोड़ दें। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 348
उनकी रसद और डाक लूट लें। उनके थानों पर हमले करें और उनके शिविर के चारों ओर अखंड चक्कर लगाते रहें। फिरंगियों को विश्राम नहीं मिलना चाहिए।''156 इस स्फूर्तिदायक और गुरिल्ला युद्ध लेख का प्रत्यक्ष में उतारने के लिए मौलवी अहमद शाह कोई उनतीस मील दूर अंग्रेजों की लखनऊ की सेना पर नजर गड़ाए बारी के पास ससैन्य बैठा था और दूसरी ओर बेगम हजरत महल भी छह हजार लोगों के साथ बिरौली के पास डटी हुई थीं। इन दोनों सेनाओं को पीटने के लिए होप ग्रांट तीन हजार सैनिकों और प्रबल तोपखाने के साथ लखनऊ के पहले बिरौली की ओर चला। दूसरे दिन उसका जहां शिविर लगा था वहां एक परम साहस की बात प्रकट हुई। अंग्रेजी सेना अपने ऊपर हमला करने आ रही है-यह सुनते ही उस सेना की पूरी जानकारी प्राप्त करने मौलवी ने अपने जासूस भेजे। उस रात इन जासूसों की टोली अंग्रेजी छावनी में बिना संकोच जब घुसने लगी तो अंग्रेजी पहरेवालों ने पूछा, "कौन जा रहा है?'' "हम 12वीं पलटन के लोग हैं।'' यह उत्तर उन्होंने सुना। यह उत्तर पूरी तरह सत्य था। क्योंकि ये सारेजासूस 12वीं रेजिमेंट के ही थे। परंतु यह 12वीं पलटन तो वह थी जिसने गत जुलाई में विद्रोह करके अपने गोरे अधिकारी का कत्ल कर दिया था। यह उस अंग्रेजी पहरे वाले को क्या मालूम ! उनका बिना संकोच घुसना, निश्छल उत्तर देना, संकोचहीनता और सावधानी देखकर वह पहरेदार 'ऑल वेल' कहकर चुप बैठ गया और यह टोली अंग्रेजी कैंप में शांति में घुस गई। वहां जो जासूसी करनी थी वह सब करके मौलवी के वे जासूस बाहर निकल आए और इस तरह मृत्यु के मुंह के दांत गिनकर ये दूत अपने मौलवी के पास लौट गए। जासूसों से प्राप्त सूक्ष्म समाचार सुनते ही उस युद्ध विशारद नेता ने अपनी योजना तुरंत बना ली। उसने अपनी सेना के साथ चार मील हटकर एक छोटा सा गांव कब्जे में लिया। उस गांव के सामने एक नदी थी और उसका किनारा ऊंचा था। वह स्थान बहुत मजबूत था। मौलवी की चाल थी कि उस गांव में वह अपनी पैदल सेना के साथ छिप बैठा रहे और उसी समय उसके घुड़सवार एक दूर के मार्ग से जाकर अंग्रेजों के बाजू पर हमला करने को तैयार रहें। मौलवी को यह भलीभांति ज्ञात था कि अंग्रेजी सेना कल भोर में असावधान स्थिति में वही आएगी। विद्रोही उस गांव में न होकर बारी में हैं, इस विश्वास से निस्संकोच आनेवाला यह शिकार बंदूक की मार में आते ही, मौलवी सामने से मारे और उसके शुरू होते ही घुड़सवार अंग्रेजों के बाजू पर टूट पड़ें। मैलसन कहता है-"मौलवी की यह योजना बड़ी चतुरतापूर्ण थी। उसकी व्यूह-रचना के ज्ञान का आभास इसी से हो जाता है।'' इस शत्रु को भी चकित कर डालनेवाली यह उत्तम चाल सफल हो, इसके लिए दो 1857 का स्वातंत्र्य समर - 349 156 1. डा. रसेल की डायरी, पृष्ठ 276।
बातें आवश्यक थी। पहली यह कि अंग्रेजों को उस गांव तक आने के पूर्व अपनी सेना उन्हें न दिखें-इस प्रकार छिपाकर रखना; और दूसरा गांव से गोलीबारी शुरू होने के पूर्व तक बगल में छिपे घुड़सवारों का शांत बैठे रहना। मौलवी ने अपने कार्य बड़ी तत्परता से पूरे किए। रात-ही-रात पैदलों के संग वह गांव उसने चुपचाप ले लिया। अपने घुड़सवार उसने तत्काल इष्ट मार्ग से बगल की ओर रवाना किए और उस गांव में अपनी सेना का अस्तित्व इतनी उत्कृष्ट रीति से छिपाए रखा कि सुबह अंग्रेजी सेना असावधान, धीरे-धीरे आ गई। घंटे-आधे घंटे की देर थी कि पांडे सेना क विजय निश्चित थी। परंतु उस आधे घंटे में ही मौलवी का बनाया हुआ यह उत्कृष्ट जाल घुड़सवारों ने बिगाड़ दिया। अंग्रेजी सेना के उस जाल के पास पहुंचते ही नियत किए अनुसार घुड़सवारों ने उनकी पीठ पर उत्तम स्थान भी घेर लिया। वहां से असावधान छह हजार अंग्रेजी सैनिकों पर हमला करना बहुत सुलभ हो गया था, परंतु इतने में घुड़सवारों के अधिकारी अंग्रेजों की दो असुरक्षित तोपें देखकर लालच में आ गए और मौलवी का आदेश भूलकर उन पर आक्रमण कर बैठे। तुरंत ही तोपें उनके हाथ में आ गई। पर क्षण भर बाद वे तोपें ही नहीं बल्कि मौलवी का सारा जाल अंग्रेजों ने छीन लिया; क्योंकि यह पीछे की भीड़ देखते ही वे पूरी तरह सावधान हो गए और सामने का गड़ढ़ा भी उन्हें दिखाई दे गया। थोड़ी सी हाथापाई होते ही अपने घुड़सवारों की लापरवाही से नष्ट हुआ जाल फेंककर मौलवी एक और अवसर खोजने आगे निकल गया। 15 अप्रैल के आसपास होप ग्रांट द्वारा बारी और बिरटौली से लखनऊ के विद्रोहियों को ऊपर धकेलते हुए उधर रूइया किले के पास अवध और अंग्रेजों की एक भिड़ंत हो रही थी। पीछे दोआब में विद्रोह को नष्ट करने कानपुर में जैसे अंग्रेजी सेना चारों ओर से विद्रोहियों को एक साथ दबाती फतेहगढ़ की ओर गई थी वैसे ही अब विद्रोहियों को अवध से समाप्त करने का कार्यक्रम कमांडर-इन-चीफ ने लखनऊ में आयोजित किया। 157 अवध के पूर्व भाग और बिहार प्रांत में ल्यूगार्ड (जिसका उल्लेख पूर्व में भी आया है) और डगलस को भेजा, बारी-बिरौली से सर होप ग्रांट और वालपोल गंगा किनारे से ऊपर-ही-ऊपर विद्रोहियों को रूहेलखंड में छापा जाए और वहीं उनसे अंतिम मारा-मारी की जाए। इस कार्यक्रम के अनुसार 9 अप्रैल को वालपोल सर्वांगपूर्ण सबल सेना ले, लखनऊ से निकलकर गंगा किनारे से ऊपर चला । 15 अप्रैल को वह लखनऊ के उत्तर में इक्यावन मील पर स्थिति रूइया के किले तक पहुंचा। यह किला बहुत बड़ा नहीं था और उसका मालिक नरपत सिंह भी एक छोटा
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157 1. On the first of April 1858 there were 96,000 British soliders in India besides a large body of reliable native troops, raised in haste some of whom had already shown that they were capable of doing good service-a very different state of affairs from the one which prevailed six months before. & Roberts, Vol. 1