भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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उनकी रसद और डाक लूट लें। उनके थानों पर हमले करें और उनके शिविर के चारों ओर अखंड चक्कर लगाते रहें। फिरंगियों को विश्राम नहीं मिलना चाहिए।''156 इस स्फूर्तिदायक और गुरिल्ला युद्ध लेख का प्रत्यक्ष में उतारने के लिए मौलवी अहमद शाह कोई उनतीस मील दूर अंग्रेजों की लखनऊ की सेना पर नजर गड़ाए बारी के पास ससैन्य बैठा था और दूसरी ओर बेगम हजरत महल भी छह हजार लोगों के साथ बिरौली के पास डटी हुई थीं। इन दोनों सेनाओं को पीटने के लिए होप ग्रांट तीन हजार सैनिकों और प्रबल तोपखाने के साथ लखनऊ के पहले बिरौली की ओर चला। दूसरे दिन उसका जहां शिविर लगा था वहां एक परम साहस की बात प्रकट हुई। अंग्रेजी सेना अपने ऊपर हमला करने आ रही है-यह सुनते ही उस सेना की पूरी जानकारी प्राप्त करने मौलवी ने अपने जासूस भेजे। उस रात इन जासूसों की टोली अंग्रेजी छावनी में बिना संकोच जब घुसने लगी तो अंग्रेजी पहरेवालों ने पूछा, "कौन जा रहा है?'' "हम 12वीं पलटन के लोग हैं।'' यह उत्तर उन्होंने सुना। यह उत्तर पूरी तरह सत्य था। क्योंकि ये सारेजासूस 12वीं रेजिमेंट के ही थे। परंतु यह 12वीं पलटन तो वह थी जिसने गत जुलाई में विद्रोह करके अपने गोरे अधिकारी का कत्ल कर दिया था। यह उस अंग्रेजी पहरे वाले को क्या मालूम ! उनका बिना संकोच घुसना, निश्छल उत्तर देना, संकोचहीनता और सावधानी देखकर वह पहरेदार 'ऑल वेल' कहकर चुप बैठ गया और यह टोली अंग्रेजी कैंप में शांति में घुस गई। वहां जो जासूसी करनी थी वह सब करके मौलवी के वे जासूस बाहर निकल आए और इस तरह मृत्यु के मुंह के दांत गिनकर ये दूत अपने मौलवी के पास लौट गए। जासूसों से प्राप्त सूक्ष्म समाचार सुनते ही उस युद्ध विशारद नेता ने अपनी योजना तुरंत बना ली। उसने अपनी सेना के साथ चार मील हटकर एक छोटा सा गांव कब्जे में लिया। उस गांव के सामने एक नदी थी और उसका किनारा ऊंचा था। वह स्थान बहुत मजबूत था। मौलवी की चाल थी कि उस गांव में वह अपनी पैदल सेना के साथ छिप बैठा रहे और उसी समय उसके घुड़सवार एक दूर के मार्ग से जाकर अंग्रेजों के बाजू पर हमला करने को तैयार रहें। मौलवी को यह भलीभांति ज्ञात था कि अंग्रेजी सेना कल भोर में असावधान स्थिति में वही आएगी। विद्रोही उस गांव में न होकर बारी में हैं, इस विश्वास से निस्संकोच आनेवाला यह शिकार बंदूक की मार में आते ही, मौलवी सामने से मारे और उसके शुरू होते ही घुड़सवार अंग्रेजों के बाजू पर टूट पड़ें। मैलसन कहता है-"मौलवी की यह योजना बड़ी चतुरतापूर्ण थी। उसकी व्यूह-रचना के ज्ञान का आभास इसी से हो जाता है।'' इस शत्रु को भी चकित कर डालनेवाली यह उत्तम चाल सफल हो, इसके लिए दो 1857 का स्वातंत्र्य समर - 349 156 1. डा. रसेल की डायरी, पृष्ठ 276।