भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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प्रकरण-9 मौलवी अहमद शाह लखनऊ की पराजय के बाद अवध एवं रुहेलखंड के विद्रोहियों का अब कोई सबल मुख्य केंद्र नही रहा था। दोआब और बिहार में अंग्रेजों की पुनर्विजय की लहर सामने आते बांध-बंधनों को धक्के-पर-धक्के देती बड़े वेग से आगे ब़ने लगी, इस कारण वहां भी पांडे पक्षीय नेताओं को आश्रय नहीं मिलने वाला था। ऐसी स्थिति में उन्हें विद्रोह के प्रारंभ में जो युद्ध पद्धति सूझी, वह सहज सूझ गई और उसका अवलंबन कर उन्होंने अंग्रेजों से यह तुमुल युद्ध जारी रखने का निश्चय किया; अंतर इतना ही था कि विद्रोह के प्रथम आवेश में यदि आज पराजय से दुर्बल होकर उस रास्ते पर कदम बढ़ाने से अंतिम सफलता तक पहुंचना बहुत दुष्कर हो गया था। तथापि दुष्कर हो, सुकर हो, म्यान से बाहर खींची तलवार समर्पण करके नीचे नहीं रखनी है, इस संकल्प से अवध के विद्रोही नेताओं ने लखनऊ गिरते ही कूटयुद्ध पद्धति स्वीकार करके रुहेलखंड के विद्रोहियों की अलग-अलग टोलियों को यह प्रख्यात आदेश जारी किया- “फिरंगियों की संगठित सेना से आमने-सामने लड़ने का प्रयास न करें; क्योंकि व्यवस्था, अनुशासन और कवायद में वे सेनाएं आपसे श्रेष्ठ हैं और उनके पास बड़ी-बड़ी तोपें हैं। इसलिए उनसे खुले मैदान की लड़ाई न लड़कर छापे मारकर उनके आवागमन को रोकते रहें। नदी के सारे घाट दबाए रहें, उनका आवागमन तोड़ दें। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 348