भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 336, कुल 418 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 336

रहे हो, इसी समय सात मील दूर कुंवर सिंह गंगा उतरकर जा रहा था। हाथियों से गंगा पार करने के समाचार से बाल्टिला की ओर उन्हें भेजकर कुंवर ने उतनी नौकाएं तुरंत इकट्ठा कीं और रात-ही-रात में उसकी सेना मेयो घाट से श्री गंगा के जलाशय में प्रवेश कर गई। अंग्रेजों को उनके साथ किया गया धोखा ध्यान में आते ही वे भोर के समय सैदोपुर घाट पर गुस्से से भरे टूट पड़े और उन्होंने पांडे लोगों की एक नौका भी डुबो दी; पर वह अंतिम नौका थी। सारी सेना कुंवर सिंह ने पहले ही गंगा पार उतार दी थी और क्षण-दो क्षण में अपनी सेना को सुरक्षित नदी पार हुआ देखकर वह भी पार हो गया होता; परंतु हाय! हाय! अभिमान, स्वतंत्रता की वह तलवार-राणा कुंवर सिंह! गंगा पाट ममें बीचोबीच पहुंच गया तब शत्रु की एक गोली आई और उसके हाथ में घुस गई। यह देखते ही उस भीष्म ने क्या किया? अश्रु बहाने लगा क्या? रक्त का बहाव रोकने के लिए किसी से सहायता मांगने लगा क्या? क्या उसका आसन उस तीव्र वेदना से किंचित् भी विचलित हुआ? नहीं-नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। हाथ पर मक्खी बैठे, उतना भी कंपित नहीं हुआ। उसने एक बार उस गोली की ओर तिरस्कार से देखा और कुंवर सिंह को मैंने एक क्षण भी अस्वस्थ किया, उस फिरंगी गोली को यह अभिमान भी न हो-ऐसा उसे लगा। उसने दूसरे हाथ से अपनी तलवार खींच ली और फिरंगी गोली से भ्रष्ट हुआ हाथ कुहनी से छांट दिया और वह काटा हुआ टुकड़ा गंगा को अर्पण करते हुए कुंवर सिंह ने गंभीर गर्जना की-हे माता, हे गंगा! बालक का यह शेषोपहार स्वीकार करें!154 भागीरथी को हे माता, हे माता कहनेवाले सैंकड़ों पृथजन आज तक जनमे और जनमेंगे, पर कुंवर सिंह, तेरे कारण वह देवी जाह्नवी पुत्रवती हुई है! 'नक्षत्रतारागृहसंकुलापि ज्योतिष्मती चंद्रमसैव रात्रिः!' इस लोकोत्तर पुरुष द्वारा यह अलौकिक उपहार अपनी त्रिलोक विख्यात मातृगंगा को अर्पित करते ही उसकी शीतल फुहारों ने उसका देह सिंचन किया और इस मातृप्रेम से उत्साहित वह वीरवर अपनी सेना के साथ गंगा पार हो गया। उसका पीछा करती अंग्रेजी सेना हताश होकर गंगा के इस ओर ही कुंवर सिंह का नाम लेना छोड़ऋकर बैठी हुई थी । तब वैर भाव से रहित हुआ वह सिंह शाहाबाद प्रांत के अपने जन्मसिद्ध जंगल में फिर एक बार घुसने लगा। 22 अप्रैल को उसने जगदीशपुर में भी प्रवेश किया और इस तरह जिस राजमंदिर से उसे कोई आठ माह पूर्व अंग्रेजों ने निकाल दिया था उसी जगदीशपुर के राजमहल में उसका अपना राजा फिर एक बार विराजने लगा। कुंवर सिंह के गंगा उतरकर आते ही उसका समान वीर बंधु अमर सिंह हजारों सशस्त्र ग्रामीणों के साथ उसे आकर मिल गया। इन लोगों को और गंगा उतरकर आए शूर 1857 का स्वातंत्र्य समर – 341 154 1. रजनीकांत गुप्त कृत 'आर्य कीर्ति', बंगाल।