भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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सिपाहियों को कुंवर सिंह ने जगदीशपुर के चारों ओर के जंगल में निशाने-निशाने पर नियुक्त किया और छापामार युद्ध से विजयश्री माया हुआ वह वीर रणपुरूष रण के लिए सज्जित होकर फिर से रण में उतरा। और फिर युद्ध शुरू हुआ। कुंवर सिंह इतनी तेजी से जगदीशपुर में आ घुसा था कि पास में ही आरा की अंग्रेजी सेना को उसके आगमन की सूचना नहीं मिली। तब जगदीशपुर के राजमहल में कुंवर सिंह फिर से आ धमका है, यह सुनकर आरा का अंग्रेज सेनानी ली ग्रांड गुस्से से आगबबूला हो गया । पूर्व अवध से अंग्रेजी सेना को थप्पड़ मारते-मारते यह कुंवर गंगा उतर आया और खुद मेरे सीने पर से चलकर जगदीशपुर में राज्य करने लगा। पूरे आठ माह नहीं हुए जब होअर इसी जंगल में कुंवर को नरम करने घुसा था। वैसे ही आज मैं भी घुसूंगा और इस सारे अपमान का बदला लेकर वैसी ही विजय भी प्राप्त करूंगा। यह निश्चय कर वह अंग्रेज सेनानी चार सौ सैनिक और दो भयंकर तोपें लेकर 23 अप्रैल को जगदीशपुर पर टूट पड़ा। अब इस युद्ध में कुंवर सिंह कैसे टिका रहे? वह आज तक लगातार लड़ते-लड़ते खड़ा हुआ है, उसकी सेना को कितने ही दिन भरपेट खाने को और घड़ी भर सोने को समय नहीं मिला! कल ही वह इस महायात्रा के बाद जगदीशपुर के राजमहल में आया-उसे और उसकी सेना को एक दिन की भी फुरसत नहीं मिली-उसकी सेना भी इस समय अंग्रेजों की रिपोर्ट के अनुसार-‘उसकी सेना बेतरतीब बिखरी हुई, शस्त्र, अस्त्र, तोपें आदि युद्ध सामग्री से अपूर्ण पंगु-सी बन गई थी।‘' उनके पस एक भी बंदूक नहीं, उनके हताश लोगों की संख्या खींच-तानकर डेढ़ हजार, उनके पास टूटे-मुड़े शस्त्र, उनमें शिक्षित सिपाही नहीं के बराबर और स्वयं उस वृद्ध सेनानी का हाथ कल ही कटा था। पांडे लोगों की ऐसी सेना पर तोपों के साथ, ताजा दम उत्तम शिक्षित आंग्ल सेना के साथ ली ग्रांड का आक्रमण। इस असमान लड़ाई में विजय अंग्रेजों की होगी, यह निश्चित था! वह अंग्रेज बहादुर जगदीशपुर की घनी झाड़ियों में घुस गया। इन झाड़ियों की लंबाई डेढ़ मील ही थी। झाड़ी में घुसते ही कुंवर सिंह के लोगों पर अंग्रेजी सेना गुराते हुए गोले छोड़ने लगी। कुंवर के पास तो तोपें थी ही नहीं, पर ऐसा होते हुए भी कुंवर की सेना अंग्रेजी सेना की तोपों की खिल्ली उड़ाते हुए उसे घेरकर बांधना चाहती थी। फिर अब छोड़ें अंतिम बाण! अंग्रेजी सेना ने जोरदार हमला करने का निश्चय किया। वे कालदूत की तरह कुंवर पर टूट पड़े, कुंवर की सेना झाड़ियों में से उनका सामना करने लगी। अरे! अंग्रेजी सेना की हिम्मत एकदम टूट गई, पीछे लौटने का बिगुल बज उठा। कुंवर ने अंग्रेजी सेना को ऐसी जगह और इस रीति से फांस लिया था कि वहां खड़ा रहना या वहां से भागना-ये दोनों ही समान रूप से घातक थे। इधर कुंवर सिंह के आदेश से उसके राजमहल का सारा महत्त्वपूर्ण सामान दूसरी जगह भेज दिया गया था। वैसे ही सरकारी 1857 का स्वातंत्र्य समर - 342