भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 338, कुल 418 में से

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पृष्ठ 338

कागज आदि न जलाकर उसने सिपाहियों को कहा कि अंग्रेजों को यहां से भगा देने के बाद वास्तविक वसूली और न्याय करने के लिए ये कागज अवश्य रखे जाने चाहिए। लोगों का उसके प्रति इतना आदर था कि उसके सामने कोई धूम्रपान करने की हिम्मत नहीं करता था।¹⁵⁵ 23 अप्रैल को अंग्रेजी सेना को ऐसी धोबी पछाड़ देकर उस वृद्ध युवा राजा कुंवर सिंह ने अपने जगदीशपुर के राजमहल में विजयश्री के साथ प्रवेश किया। यह उसका अंतिम प्रवेश था, क्योंकि विश्व की रंगभूमि पर अब कुंवर सिंह फिर से प्रकट नहीं होगा। उसके हाथ में गंगा पार में जो भयानक घाव हुआ थ वह बहुत बढ़ जाने के कारण वह राजपूत कुलकीर्ति राजा कुंवर सिंह इस विजय के तीसरे दिन 23 अप्रैल को अपने पूर्वजों द्वारा अर्जित राजमहल में स्वतंत्रता के झंडे के नीचे चिन्मय रूप में लीन हो गया। जब उसका जन्म हुआ था तब उसकी भूमि स्वतंत्र थी और उसका प्राणोत्सर्ग भी स्वतंत्रता के झंडे के नीचे हुआ। जिस दिन वह मरा उस दिन जगदीशपुर के रजवाड़े पर अंग्रेजों का निशान नहीं, उसके स्वदेश एवं स्वधर्म का स्वातंत्र्य थी और उसका प्राणोत्सर्ग भी स्वतंत्रता के झंडे के नीचे हुआ। जिस दिन वह मरा उस दिन जगदीशपुर के रजवाड़े पर अंग्रेजों का निशान नहीं, उसके स्वदेश एवं स्वधर्म का स्वातंत्र्य ध्वज फहरा रहा था। राजपूत के लिए इससे अधिक पुण्यतर मृत्यु कौन सी हो सकती है! उसने अपने अपमान का प्रतिशोध लिया। उसने रणांगण में अत्यल्प साधनों से अंग्रेजी सेना जैसे प्रबल शत्रु के अनेक बार दांत खट्टे किए थे। उसने स्वधर्म से धर्मद्रोह या स्वदेश से देशद्रोह नहीं किया। उसने अपनी भूमि की दास्य श्रृंखला तोड़कर उसे स्वतंत्र किया और युद्ध में आज अस्सी वर्ष के उस वृद्ध कुंवर सिंह का विजयश्री ने अलौकिक आलिंगन किया हुआ है, तो हे सिंह कुमार! यही वह मुहूर्त है और यही वह वेला, हे धर्मपक्षीय भीष्म! यही उत्तरायण है-इसलिए तू अपने वीर तन का त्याग कर! और वह भी रोग से नहीं, युद्ध के घावों से! जैसा तेरा जीवन लोकोत्तर वैसी ही तेरी मृत्यु भी! इसीलिए वह कुंवर सिंह उस दिन मरा। राजपूत के लिए इससे अधिक पुण्यतर मृत्यु कौन सी हो सकती है! श्री कुंवर सिंह की भूमिका किसी वीर काव्य के नायक स्थान पर शोभित हो सकती है। सन् 1857 के क्रांतियुद्ध में यदि कोई सब प्रकार से योग्य नेता था तो वह कुंवर सिंह ही था। युद्धकला में उसकी बराबरी कर सके, ऐसा कोई नहीं था। स्वातंत्र्य युद्ध में कूट युद्ध का कितना महत्त्व होता है, यह सबसे पहले कुंवर ने पहचाना और शिवाजी के कूट युद्ध का सही-सही नकल कैसे की जाए, उसी अकेले ने सिद्ध किया। तात्या टोपे और कुंवर सिंह के युद्ध चातुर्य की तुलना करें तो कुंवर की कूट पद्धति ही अधिक बेतोड़ थी, ऐसा दिखाई देता है। तात्या ने कूट युद्ध की काट करने में अधिक चतुराई प्रकट की। परंतु कुंवर ने निषेध जैसी ही विधि रूप में भी कूट युद्ध की पूर्णता 1857 का स्वातंत्र्य समर – 343


155 1. रजनीकांत गुप्त कृत 'आर्य कीर्ति', बंगाल।

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