भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 339, कुल 418 में से

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सिद्ध कर दी। तात्या ने सैनिकों का नाश नहीं होने दिया; परंतु कुंवर ने तो उसके अतिरिक्त शत्रु सेना का यथावसर नाश भी किया। कूट युद्ध में पूर्ण विजय पाने के लिए यह सावधानी रखनी होती है कि बड़े शत्रु के आगे से भागते समय उस पराजय से अपनी सेना हताश या भयग्रस्त न हो। जान-बूझकर स्वीकारी हुई पराजय से उनकी आत्मनिष्ठा दुर्बल न हो और लड़ाई की बार-बार टाला-टूली से लड़ाई के संबंध में उनके मन में कोई स्थायी भय न समा जाए-इसके लिए छापामार युद्ध का सेनानी हमेशा सतर्क रहे। लड़ाई टालना अलग बात है और लड़ाई लड़ते हुए भीरुता के कारण पराजित होकर पीछे हटना अलगा बात। अर्थात् कूट युद्ध में भीरुता के कारण पराजित होकर कभी पीछे नहीं हटना चाहिए। लड़ाई लड़नी ही पड़े तो ऐसी लड़ें कि शत्रु के मन में अपनी शूरता का भयंकर भय उत्पन्न हो जाए और अपनी सेना आत्मनिष्ठा की स्फूर्ति से भर जाए। सेनानी की मुख्य खूबी यही होनी चाहिए कि अधिक हानि की आशंका की स्थिति मेमं वह सामना टालता जाए। पर जब सामना हो ही जाए तो ऐसी शूरता प्रदर्शित करे कि जैसी बाजी प्रभु ने पावन घाटी में या कुंवर ने तानू नदी के पुल पर दिखाई। सारांश यह कि लाभ में न हो तो लड़ाई टाले, लाभकारी हो तो लड़ाई लड़े, परंतु कभी भी रण में भय या अनुशासनहीनता से अपनी बदनामी न करवाए। शूरता से ऐसी लड़ाई लड़े कि रण में पराजय हो तो भी विश्व में सत्कीर्ति बढ़े। इससे शत्रु डर जाता है, अपनी सेना में अनीति नहीं बढ़ती, अनुशासन नहीं छूटता, उत्साह बढ़ने लगता है, शूरता का उत्कर्ष होता है, विजय पक्की होती है। शत्रु ने हमें शूरता से जीता है, ऐसा कभी न होने देना ही कूट युद्ध की कुंजी है। तात्या टोपे ने छापामार युद्ध के विधिरूप का अवलंबन अधिक बार नहीं किया था। जब वे नर्मदा उतरे और जब कुंवर सिंह गंगा उतरे तब दोनों के युद्ध-कौशल में क्या अंतर था, यह स्पष्ट दिखता है। तात्या टोपे की सेना को डर के कारण बार-बार पराजय स्वीकार करनी पड़ी। परंतु कुंवर ने पीछे हटते हुए भी शत्रु अपनी शूरता की डींग हांके, ऐसी स्थिति नहीं बनने दी और जब-जब अवसर मिला तब-तब शत्रु को ऐसा झापड़ लगाया कि रण में उसकी सेना में अधिक आत्मनिष्ठा और वीरस्फूर्ति बनी रहती। तात्या अधिकतर अपनी इच्छा के अनुसार चल नहीं पाते होंगे और इसलिए उनको जो चाहिए था उस परिस्थिति में वे उतना नहीं कर पाते थे; पर कुंवर सिंह ने छापामार युद्ध लड़ते हुए शिवभूप की तरह ही सेना में कातरता और अनीति नहीं घुसने दी और लड़ाई टालना और लड़ाई करना-इस विधि-निषेध से वक्र युद्ध के दोनों ही अंगों का खेल करने में अप्रतिम युद्ध-कौशल दिखाया। इसीलिए वह अंग्रेजी सेना के सीने पर तांडव करते-करते पवित्र विजयानंद में, अपने राजभवन में, स्वतंत्रता के झंडे तले और देवदूतों के पंखों के नीचे पुण्य पावन मृत्यु प्राप्त कर सके। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 344

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