भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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सन् 1857 की 26 अप्रैल को इस दिव्य पुरूष के देवलोक जाते ही उसके सिद्धांतों का, उसके ध्येय का, उसकी सेना का और उसके ध्वज का सारा भार अपने सिर लेकर कुंवर सिंह का कनिष्ठ बंधु अमर सिंह गद्दी पर बैठा। कुंवर सिंह का यह कनिष्ठ बंधु अमर सिंह, एक ही सिंहनी की गर्भगुहा से संभव हुए थे, वे दो केसरी किशोर अपने प्रखर नखों की तीक्ष्णता में परस्पर तुल्य थे। भाई की मृत्यु के कारण इस लड़ाई में जरा भी ढील न देकर पूरे चार दिन भी विश्राम न करते हुए यह रणपंडित अमर सिंह भी आरा शहर का दरवाजा ठोकने लगा। ली ग्रांड की पराजय सुनकर पीछे गंगा किनारे ही खड़ा ल्यूगार्ड व ब्रिगेडियर डगलस दोनों अपनी-अपनी सेना के साथ अमर सिंह पर 3 मई को चढ़ आए। मिहिया, हंतमपुरा, दलितपुरा में विद्रोहियों पर हर दो-तीन दिन बाद अंग्रेज गोलीबारी करते। जगदीशपुर भी अंग्रेजों ने अपने कब्जे में ले लिया। उस सबल सेना के पंजे से छूटने तथा पराभव टालने को अमर सिंह ने एक अप्रतिम युक्ति खोज ली थी। उसने रणक्षेत्र में अपनी सेना की छोटी-छोटी टोलियां बनाईं और पराजय का रंग दिखते ही वे टोलियां शीघ्र ही इधर-उधर हो जाती। उस प्रदेश के इंच-इंच की जानकारी उन्हें होने से नियत समय पर सारी टोलियां नियत स्थान पर इकट्ठा होतीं और फिर से अंग्रेजों को बिलकुल दिखती ही नहीं थी। किसी भूत-प्रेत की तरह उस सारे प्रदेश में अंग्रेजी सत्ता के कण-कण को पछाड़ते हुए भी अमर सिंह उन्हें प्रत्यक्ष कहीं नहीं दिख रहा था। एक टोली राजपुर होती, दूसरी दमरान तो तीसरी कर्मनाशा पर बने रेल कारखाने धूल में मिला देती। जंगल के इस छोर से अमर सिंह को निकालें तो वह जंगल का दूसरा छोर जीत लेता, जंगल के उस छोर की ओर अंग्रेजी सेना दौड़ती तो इस छोर पर अमर सिंह फिर राज्य करने लगता। शाहाबाद प्रदेश के समस्त लोकसमूह की सहानुभूति और सहकर मिलते रहने से अमर सिंह के साथ रण का खेल-खेलते हुए ल्यूगार्ड और उसकी विशाल सेना की हड्डियां नरम पड़ गईं। 15 जून को वह निराश-हताश अंग्रेज सेनापति इस्तीफा देकर इंग्लैंड चला गया और उसकी थकी हुई सेना आराम करने छावनी में चली गई। यह देखते ही सारी छोटी-छोटी टोलियां एकत्र हो गईं और जगदीशपुर का राजा अमर सिंह और उसकी सेना रण-मैदान में फिर से प्रकट हो गई। उस विजय आवेश से भरी उस सेना ने गया में कैद सारे विद्रोहियों को वहां की अंग्रेजी पुलिस से मुक्त कराया और इस तरह गया शहर स्वतंत्र हो गया और आरा की अंग्रेजी सेना को युक्ति से शहर के बाहर बुलवाकर उसपर अमर सिंह का झंडा लगा दिया। इस तरह हर ओर अमर 1857 का स्वातंत्र्य समर - 345