१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसिंह का कहर बरपा और जुलाई में उसने फिर एक बार जगदीशपुर में प्रवेश किया। जुलाई बीती, अगस्त बीता, सितंबर बीता फिर भी जबदीशपुर में स्वतंत्रता का झंडा हर दिन की सूर्यकिरण में फहराता ही रहा। ब्रिगेडियर डगलस जैसा अंग्रेज सेनानी और सात हजार अंग्रेजी सेना उस छोटे से राजा पर दांत भींचकर टूटते रहे, उसका सिर काटने या उसकी योजना भंग करने का अनेक देशद्रोही भी उसकी सेना में धन का लालच देकर भेजे गए। जंगल में नए रास्ते बनाए गए, नाके-नाके पर अंग्रेजी सेना की पक्की कतार बांधी गई। परंतु कुछ भी करें, जगदीशपुर का राजा परेशान नहीं हा पाया। उसके अनंत दाव-घातों की सारी कथाएं यहां स्थानाभाव के कारण नहीं दी जा सकती । इतना कहना काफी है कि स्वतंत्रता के पुण्य रण में वह वीर अमर सिंह आमरण ऐसे ही पूर्ण साहस से समरांगण में भिड़ा रहा। अंत में उसे जगदीशपुर में ही कैद करके गाढ़ देने के उद्देश्य से अलग-अलग सात अंग्रेजी सेनाएं जगदीशपुर के सारे रास्ते बंद करती हुई चढ़ आईं। प्रदेश भर से सारे विद्रोहियों को इस जाल से भगाते-भगाते 17 अक्तूबर को वह कालपाश जगदीशपुर की सीमा से जा भिड़ा। हाय! हाय! अब इस कालपाश में वह स्वतंत्रता-प्रेमी सिंह पकड़ा जाएगा! नियत समय पर ये सातों बलशाली सेनाएं अचानक जगदीशपुर को घेर लें, उसे कड़ा आदेश जारी हुआ और उस आदेश के अनुसार चारों ओर से बंद उस जगदीशपुर के पिंजड़े के अमर सिंह पर कठोर वार हुआ। पर शाबाश रे अमर सिंह, शाबाश! इस कठोर वार को पिंजड़ा मिला, पर सिंह वहां नहीं मिला तो नहीं मिला! क्योंकि छह सेनाएं छह रास्तों से अचूक आ गईं, फिर भी सातवीं सेना आने में पांच घंटे की देर हो गई और इस विलंब का कुशाग्र अमर सिंह सुशीघ्र लाभ लेकर उसी रास्ते से और उन्हीं पांच घंटों में सेना के साथ फरार हो गया। इस सात डोरियों के जाल की सातवीं डोरी टूटते ही सिंह मुस्कुराता हुआ बाहर निकला और भक्ष्यार्थ लगाया गया वह जाल उसी के नखों में फंसकर पूरी तरह फट गया। अतः अब ऐसे जाल बुनते बैठने की बात भूलकर अंग्रेजों ने चुने हुए घुड़सवारों की एक टोली तैयार की और वह टोली विद्रोहियों का लगातार पीछा करे, यह आदेश दिया। यह अंखड पीछा अमर सिंह की पीठ को लगते ही उसे तनिक भी विश्राम असंभव हो गया। यह अखंड पीछा अमर सिंह की पीठ को लगते ही उसे तनिक भी विश्राम असंभव हो गया। साथ ही अंग्रेजों के पास अब एन्फील्ड राइफल जैसी नई बंदूकें आ गई थी। उनकी मार लंबी थी और उनके सामने विद्रोहियों की मस्कट बंदूके अच्छा काम नहीं कर सकती थीं। 19 अक्तूबर को अंग्रेजों ने एक गांव में पहले क्रांतिकारियों को पीछे से घेरा और उनमें से तीन सौ लो काट डाले। शेष बचे एक सौ लोग एक गांव खेड़े में लड़ते बाहर के खेत में पागल बाघों जैसे घुस गए। परंतु उनको भी अंग्रेजों की नई कुमुक ने घेर 1857 का स्वातंत्र्य समर – 346