भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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जोड़ी कंधे से कंधा लगाए मित्र बनकर लड़ने खड़ी हो गई थी; जिसको बढ़ाने और फैलाने में अवध की पूरी जतना लगी हुई थी और जिसे प्रत्यक्ष रीति से पड़ोस के सभी प्रदेशों की सक्रिय सहानुभूति मिली हुई थी। वह विद्रोह विद्रोही सिपाहियों पर प्राप्त दो-चार शुद्ध एवं अभूतपूर्व जीतों से दबा देना संभव नहीं था। “एकदम प्रारंभ से इस ‘विद्रोह’ को सेना के बाहर फैली विस्तृत जनशक्ति ने अंग्रेजों के प्रभुत्व के विरुद्ध एवं उनकी राज्यसत्ता के विरुद्ध क्रांतिकारी विद्रोह का स्वरूप ही प्राप्त हो गया था। हमारी वास्तविक लड़ाई पूरी तरह विद्रोही सिपाहियों के साथ ही थी, यह पूरी तरह झूठ है। हमारे शत्रु केवल सिपाही होते तो देश में शांति स्थापित करने में चुटकी बजाने से अधिक का समय नहीं लगता। “शत्रु को पूरी तरह तितर-बितर कर उनकी तोपें अपने कब्जे में लिये बिना हमने शत्रु को एक भी लड़ाई में नहीं छोड़ा; पर बार-बार लगातार और कई बार पिटने के बाद भी ये लोग फिर ताजा होकर नई लड़ाई के लिए तैयार दिखाई देते थे। एक प्रांत पर कब्जा कर अंग्रेजी सेना वहां शांति व्यवस्था बनाती तो दूसरे प्रदेश में तभी विद्रोह की आंधी चलती। महत्त्व के स्थानों को जोड़नेवाला कोई राजमार्ग खोला जाता तो तुरंत उसकी नाकेबंदी कर वहां का यातायात तोड़ दिया जाता। एक विभाग से विद्रोहियों को जैसे ही भगाया जाता वैसे ही दुगुनी-तिगुनी संख्या में वे दूसरे किसी विभाग में खड़े दिखाते देते। हमारी सेना उनकी सेना पर झपटकर आक्रमण करती हुई आगे बढ़ती जाती तो विद्रोहियों की टुकड़ियां पिछला सारा प्रदेश अपने कब्जे में ले लेतीं।‘‘149 डॉ डफ द्वारा लिखे गए वास्तविक सत्य की पहचान अंग्रेजों को बहुत अंत में हुई। परंतु पांडे लोगों में से हर एक को बिलकुल प्रारंभ से इसकी पूरी अनुभूति थी। अपने राजा और अपने देश के लिए उन्होंने समरांगण में प्राण दिए। वे ये बातें स्पष्ट बोलते थे, पर उनकी स्त्रियों ने भी वास्तव में उतना ही कठोर निश्चय प्रकट किया था। जब शूरवीर अंग्रेजों ने लखनऊ के जनानखाने पर हमला किया तब उन्हें अंतःपुर में कुछ स्त्रियां मिलीं। दरवाजा तोड़कर अंदर घुसने पर अंग्रेज सोल्जरों ने यहां भी गोलियां दागीं जिससे कुछ स्त्रियां मर गईं। जो बचीं उन्हें कैद में रखा गया। लखनऊ को जला डाला गया। वह सब देखकर अब विद्रोही तुरंत शरण में आ जाएंगे, इस कल्पना से अंग्रेज खुश हुए। अपने देशबंधुओं के इस आनन्दोन्माद में सहभागी अंग्रेज जेलर उन रानियों को खिझाने के लिए पूछता,‘‘विद्रोह पूरी तरह विफल हो गया है, ऐसा तुम्हें नहीं लगता?‘‘ उस समय उन कृतनिश्चयी बेगमों ने स्पष्ट कहा, ‘‘इसे कुचलना तो बहुत दूर की बात है, अंततोगत्वा पराजय तुम्हारी ही होगी।‘‘150 1857 का स्वातंत्र्य समर – 332 149 1. डॉ डफ कृत-‘इंडियन रिबेलियन’, पृष्ठ 241-43 । 150 2. ‘नैरेटिव ऑफ दि इंडियन म्यूटिनी’, पृष्ठ 300; रसेल की डायरी, पृष्ठ 400।