१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरण-8 कुँवर सिंह और अमर सिंह जगदीशपुर की घाटी से होअर की शिकारी टोली द्वारा भगाए जाने के बाद राजमहल का सिंह वृद्ध युवा कुंवर सिंह अब अपनी स्वतंत्रता पर घात करनेवाले के कंठ पर कब प्रबल हमला कर सके, इस अवसर की ताक में पश्चिम बिहार के वनों में छिपते-छिपाते चक्कर काट रहा था। उसकी अयाल गुस्से से खड़ी थी, उसके पंजे बदला लेने के लिए फैले हुए और उसके नेत्र शत्रु की गरदरन पर झपट पड़ने के यौगय अवसर की ताक में थे। जैसे अपनी कोठरी में घूमता सिंह हो वैसे ही वह सिंह उन झाड़ियों में इस सिरे से उस सिरे तक चक्कर काट रहा था। उस सिंह के साथ उसके अन्य शावक भी थे। उसके भाई अमर सिंह, निस्स्वार सिंह व जवान सिंह। ये लोग भी अपने-अपने अनुयायियों के साथ वहां आए थे। और तो और, उसकी प्रिया सिंहनी भी युद्धवेश में उस राज्य में अपने वनराज के साथ रिपुरक्त-पान करने को सज्जत थी। शाहाबाद जिले में उसकी वंश परंपरागत भूमि विदेशियों के कब्जे में थी, उसकी सेना थोड़ी सी थी-एक हजार दो सौ सिपाही और अधिकारी और कोई चार सौ अशिक्षित नौकर उसके पास थे। उसके जगदीशपुर के राजमहल में विदेशी शत्रु का अमंगल डेरा पड़ा हुआ था। उसके देवालयों और देवमूर्तियों का उन्मुक्त म्लेच्छों ने चकनाचूर कर दिया था। इस सब अपमान से वह चिढ़ गया था, फिर भी कुंवर सिंह गुस्से के अधीन नहीं हुआ 1857 का स्वातंत्र्य समर - 333