भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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पृष्ठ 329, कुल 418 में से

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था। उसने जनहानि न होने दी और जिस दिन जगदीशपुर छोड़ा उसी दिन केवल मनोविकारों का दास न होकर और आवेश में विजय अवसर न चूकते हुए एक नई पद्धति का युद्ध लड़ने की योजना बनाई थी। वह जगदीशपुर पर यकायक हमला करने नहीं गया था और शहाबाद प्रदेश में भी उस दृष्टि से नहीं रुका रहा। उस प्रदेश पर और राजधानी पर अंग्रेजों का मजबूत बंदोबस्त था, यह उसे ज्ञात था। इसलिए उसने राजधानी हारने की बिलकुल चिंता नहीं की। उसे जो चिंता थी वह यह कि राजधानी हारे या जीते, मेरे स्वातंत्र्य युद्ध का जरतारी ध्वज अटल लहराता रहना चाहिए। उसकी नई पद्धति स्वतंत्रता संग्राम की अनन्य संजीवनी है। उस युद्ध पद्धति का नाम ‘छापामार युद्ध’ है। इसलिए अपने अपमान के क्षोभ से अंग्रेजों की सबल सेना पर दीप-पतंग-त्वरा से न झपटते हुए कुंवर सिंह उस पश्चिम बिहार के वन में शोण नदी के किनारे-किनारे अंग्रेजों के दुर्बल स्थान टटोलता छिपा हुआ था। लखनऊ के निःपात के लिए आजमगढ़ की ओर से अधिकतर नेपाली और अंग्रेजी सेना अवध की ओर चल पड़ी है, यह सूचना उसे मिली। उसकी तीव्र नाक को इस शिकर की गंध आते ही जगदीशपुर का सिंह हमला करने उस वन से बाहर निकला। क्रोध और मनोविकार के क्षणिक समाधान के अधीन होनेवाले दुर्बल लोगों की तरह विजय की संभावना कम होते हुए भी एक राजधानी के चारों ओर ही घूमते रहनेवाला वह आदमी नहीं था, वह तो सिद्धांत की अंतिम विजय जिधर दिखे उधर ही समर करनेवाला छापामार वीर था। लखनऊ की ओर सारी अंग्रेजी सेना जा रही थी, पर अंग्रेजों की आंखें जगदीशपुर की ओर होने से कुंवर सिंह ने अभी उस ओर जाने की योजना नहीं बनाई। पूर्व अवध में जहां अंग्रेजी मजबूती बिलकुल ढीली पड़ी थी उसने उधर झपट्टा मारने की योजना बनाई। अवध में घुसते ही वहां के अनेक विद्रोहियों को इकट्ठा कर आजमगढ़ पर हल्ला करें और वहां विजय मिलते ही श्री काशी क्षेत्र पर या इलाहाबाद पर भी हमला करें और इस तरह जैसे को तैसा बनकर जगदीशपुर का बदला लिया जाए-ऐसा दांव सोचकर कुंवर सिंह पूर्व अवध की ओर निकला । सन् 1857 की 18 मार्च को बेतवा के विद्रोही उससे आकर मिले और उस संयुक्त सेना ने अतरोलिया के किले के पास अपना शिविर लगाया। आजमगढ़ अतरोलिया से पच्चीस मील दूर था। कुंवर सिंह की सेना इतनी पास आ गई है, यह समझते ही, कोई तीन सौ पैदल और घुड़सवार, दो तोपें-इतनी अंग्रेजी सेना लेकर मिलमन अतरोलिया की ओर बढ़ा। 22 मार्च का बेतवा के विद्रोही उससे आकर मिले और उस संयुक्त सेना ने अतरोलिया के किले के पास अपना शिविर लगाया। आजमगढ़ अतरोलिया से पच्चीस मील दूर था। कुंवर सिंह की सेना इतनी पास आ गई है, यह समझते ही, कोई तीन सौ पैदल और घुड़सवार, दो तोपें-इतनी अंग्रेजी सेना लेकर मिलमन अतरोलिया की ओर बढ़ा। 22 मार्च को प्रातःकाल की सूर्य किरण रण-मैदान को स्पर्श भी न कर पाई थी कि मिलमन और क्रांतिकारी सेना की आंखें मिलीं। एकाएक बढ़ आई अंग्रेजी सेना को देखकर झिझके विद्रोहियों को क्षण भर का भी अवसर न देकर मिलमन ने लड़ाई प्रारंभ कर दी। विद्रोही लड़ने लगे, पर वे विद्रोही अंग्रेजों से कितने लड़ पाते? उनकी तुरंत पराजय हुई। कुंवर सिंह ने इतने तामझाम से हमला किया था, उसकी इस अंग्रेजी सेना ने कैसी फजीहत की। सारी रात चलकर आए होते हुए भी विद्रोहियों से इतने जोर से लड़नेवाली अंग्रेज सेना और उसके सेनानी 1857 का स्वातंत्र्य समर – 334

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