१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसचमुच शाबासी पाने योग्य हैं। तुम अपना सुबह का कलेवा गाढ़े पसीने की कमाई से नहीं, गाढ़े रक्त की कमाई से कर रहे हो, इसलिए सारे अंग्रेज सैनिकों, अपने सेनानी के साथ उस अमराई में शांति से बैठकर उस बाल सूर्य की किरणों और विजय के आनंद में अपना कलेवा ग्रहण करो। शस्त्र एक तरफ रखे गए, कलेवा तैयार हुआ, भूख के समय कौर मुंह तक गया-प्यास मिटाने गिलास होंठो तक गया। उतने में- हा! हा! यह क्या? होंठों से लगता गिलास छूट गया, मुंह का कौर मुंह में रहा। कलेवा के पात्र तड़ातड़ टूटे। शस्त्र सपासप बाहर आए अरे, कुंवर सिंह तो नहीं आया? हां, हा, मदमस्त आंग्ल गज के गंडस्थल पर हमला करके कोसिला से ब्रिटिश सेना को जो पीछे हटाना आरंभ किया तो सीधे आजमगढ़ तक कुंवर सिंह ने उस अभागे मिलमन को दौड़ाया। आजमगढ़ में पहुंचने के बाद मिलमन की जान में जान आई। उसके आवश्यक संदेश के कारण कोई तीन सौ पच्चीस लोगों की नई कुमुक बनारस और गाजीपुर से भेजी गई और इस सारी सेना के सेनापति पद पर कर्नल डेम्स की नियुक्ति हुई। अब आजमगढ़ जैसी मजबूत जगह, दोगुनी बढ़ी हुई अंग्रेजी सेना और कर्नल डेम्स जैसा ताजा दम सेनापति, तब पिछली मामूली पराजय का प्रतिशोध लेने की बात क्यों न सोची जाए? इसलिए कर्नल डेम्स 27 मार्च को आजमगढ़ छोड़कर कुंवर सिंह को मजा चखाने निकला। बाहर निकलते ही वह जीत भी गया और कुंवर सिंह पर ऐसी जीत पाते ही उस भयानक नाटक का ही एक भयानक प्रयोग शुरू हो गया। कुंवर सिंह ने इस नए सौल्जरों और नए सेनापति को ऐसा थप्पड़ लगाया कि कर्नल डेम्स मैदान छोड़ सीधे आजमगढ़ की ओर भाग और शहर की दीवारों के पीछे जाकर छिप गया। उसकी सेना में से कोई कुंवर सिंह पर आक्रमण के लिए बाहर मुंह निकालने को भी तैयार नहीं था। अंग्रेजों की यह पराजय सुनकर इलाहाबाद में बैठे अंग्रेज गवर्नर का चेहरा चिंता से काला हो गया। "इस चढ़ाई के समय गवर्नर जनरल केनिंग इलाहाबाद में ही था। केनिंग कुंवर सिंह की युद्ध-क्षमता, धैर्य, बहादुरी आदि सभी गुणों से परिचित था। अतः आनेवाले संवाद का रूप उसके सामने स्पष्ट था।151 हर नए दिन उसके पास नई सेना इकट्ठी होती जा रही थी। लखनऊ में हारकर भागे हुए सिपाही भी अब उसके झंडे की ओर दौड़ते चले आ रहे थे और जिसमें इस हारी एवं असंगठित सेना को भी सफलता दिलानेवाले छापामार कुशलता वास कर रही थी, वह जगदीशपुर का राणा शीघ्र ही आजमगढ़ को ताला लगाकर बीच के इक्यासी मील की यात्रा कर और बनारस शहर पर अचानक हमला करके इलाहाबाद में गवर्नर जनरल और लखनऊ में कमांडर-इन-चीफ दोनों की ही कलकत्ता से जुड़ी डोर काटने से चूकेगा नहीं, यह तुरंत लॉर्ड केनिंग की समझ में आ गया। विद्रोह के प्रारंभ में सिख लोगों की राजनिष्ठा के कारण बनारस और इलाहाबाद शहर अंग्रेजों के हाथ में आ जाने से वे स्वतंत्रता का मुंह बांधकर हिंदुस्थान का गला दबा सके थे; अंग्रेजों के हाथ आया 1857 का स्वातंत्र्य समर - 335 151 1. मैलसन कृत-'इंडियन म्यूटिनी', खंड 4, पृष्ठ 321 ।