१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
पृष्ठ 331, कुल 418 में से
संदर्भ में पढ़ेंअवसर कहीं अब कुंवर सिंह छीन तो नहीं लेगा, इस चिंता से लॉर्ड केनिंग ने तत्काल आदेश दिया कि इस विद्रोही पर स्वयं लॉर्ड मार्ककेर ही आक्रमण करें। क्रीमिया युद्ध में ख्यातिप्राप्त और हिंदुस्थान का पूरा अनुभवी यह लॉर्ड मार्क केर लगभग चार सौ योद्धाओं और तोपों के साथ कूच करता आजमगढ़ से आठ मील दूर आकर ठहरा। कुछ विश्राम कर 6 अप्रैल को भोर ही उसने सावधानी से आगे कदम बढ़ाया। सुबह छह बजे उसे समाचार मिला कि पास ही कुंवर सिंह की सेना उसकी ताक में है। लॉर्ड मार्क केर ने 'ताक' की उसको कोई जानकारी नहीं है, ऐसा स्वांग कर सेना को सज्जित करके कुछ आगे बढ़ाया और तुरंत ही कुंवर सिंह के दांए बाजू पर हल्ला किया। तभी कुंवर सिंह का बायां बाजू गोलियों की बौछार कर उठा। वह वृद्ध युवा एक सफेद घोड़े पर बैठकर अपनी सेना में पितामह भीष्म की तरह चमक रहा था। अंतर इतना ही था कि तब भीष्म दुर्योधन की ओर से लड़ रहे थे और अब यह वृद्ध युवा धर्मराज की ओर से लड़ रहा था। वह स्वातंत्र्य-धर्म हेतु, देश-धर्म हेतु लड़ रहा था। उसकी सेना चार हजार के लगभग थी। परंतु उसमें संख्या के अनुपात में बल नहीं है, यह वह जानता था और इसलिए आज सारा भार उसके अपने अकेले के पुरुषार्थ पर टिका हुआ है, यह देखकर वह शुभ्र अश्वारूढ़ अस्सी वर्ष का सेनापति अपनी सेना के साथ लड़ने में अपने को झोंके हुए था। वह मार्क केर के इधर-उधर अपनी सेना फैलाते ले गया। मार्क केर की तोपें उस पर जबरदस्त मार कर रही थीं और उन्हें उत्तर देने के लिए उसके पास तोपें ने होते हुए भी उसने मार्क केर की पिछाड़ी अपनी सेना जमा कर ली। अंग्रेज सेनापति की आफत हो गई और उसने अपनी तोपें थोड़ी पीछे ले लीं। यह देखते ही विद्रोही जोर का जयनाद करते हुए आगे बढ़ने लगे। कुंवर सिंह ने बीच में ही अवसर खोजकर अंग्रेजों की पिछाड़ी को कस दिया। अंग्रेजी हाथी पागल होकर इधर-उधर दौड़ने लगे। उसके महावत हाथी के गले से लिपट-लिपटकर अपनी जान बचाते भागने लगे और उसके नौकर जल्दी से रण छोड़कर भाग गए। फिर भी मार्क केर ने धीरज नहीं छोड़ा। उसने सामने की विद्रोहियों की टोलियां विभाजित कर और वहां के घरों पर कब्जा कर सामने का बाजू जीत लिया। लेकिन कुंवर सिंह ने भी अंग्रेजों की पिछाड़ी मारकर जीत ली। अब यह विचित्र लड़ाई बराबर उलटी की पलटी हो गई; क्योंकि प्रारंभ में कुंवर सिंह के सामने अंग्रेजों का मुंह था। लड़ते-लड़ते अब कुंवर सिंह उनके पीछे हो गया, जिससे कुंवर सिंह के मुंह की ओर अंग्रेजों की पीठ हो गई। कुंवर सिंह उनके पीछे हो गया, जिससे कुंवर सिंह के मुंह की ओर अंग्रेजों की पीठ हो गई। कुंवर सिंह ने उनकी पीठ को आग लगा दी। अपनी पिछाड़ी की रसद में विद्रोहियों द्वारा लगाई आग देखकर लॉर्ड मार्क केर ने यद्यपि धैर्य नहीं छोड़ा तथापि रणांगण छोड़ने का निश्चय किया। पूरी विजय प्राप्त नहीं हो रही थी तब भी मार्क के रण छोड़ लड़ते-लड़ते निकला और 1857 का स्वातंत्र्य समर – 336