१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअपनी तोपों की सहायता से रात में उस शहर में आ गया। कुंवर सिंह के इस रण-तांडव के संबंध में प्रख्यात इतिहास लेखक मैलसन कहता है-"उसकी मुहिम का नक्शा प्रशंसनीय था, परंतु उस नक्शे के अनुसार व्यवहार करने में उसने काफी गलतियां की थीं। मिलसन जब उसके हाथ आ गया तब उसका पिछला रास्ता रोकना छोड़ कुंवर सिंह ने उसके मुंह पर मारा। उसका पीछा कर उसे आजमगढ़ में बंद करने पर कुछ सेना आजमगढ़ में रखकर शेष लोगों के साथ कुंवर सिंह यदि बनारस पर तत्काल आ जाता तो लॉर्ड मार्क केर से इससे भी जबरदस्त लड़ाई वह लड़ लेता। वास्तविकता देखें तो वे सारे अवसर उस कुंवर सिंह जैसे योग्य पुरूष के ध्यान में आए बिना न रहे होंगे, परंतु वह परिस्थिति से बंधा हुआ था। जिस-जिस छोटे नायक ने अपने लोग उसके झंडे के अधीन लड़ने के लिए भेजे थे उसमें से हर एक की अपनी-अपनी बुद्धि थी-ऐसे अनेक बुद्धिमानों की बेलगाम बहसों का निर्णय मिश्रित जोड़-तोड़ में ही करना होता है ˙ ˙ ।" लॉर्ड मार्क केर आजमगढ़ में घुसकर वहां की अंग्रेजी सेना में मिल गया तब भी कुंवर सिंह का आजमगढ़ पर कसाव कम नहीं हुआ। वह सारा शहर विद्रोहियों के ही नियंत्रण में था और उसके आसपास के क्षेत्र में उनकी निगरानी भी थी। अपनी सेना का वास्तविक बल कितना है, यह तत्काल जानने की कला भी सेनानी को अवश्य होनी चाहिए और इस कला में यदि कोई सेनानी अति चतुरता दिखाता हो तो वह कुंवर सिंह था। उसने शत्रु का बल जैसे तौला हुआ था उसी अचूकता से उसने अपनी सेना के गुण-दुर्गुण भी माप रख थे। अतः अंग्रेजों के परकोटे या अंग्रेजों पर हमला करने के चक्कर में वह पड़ा ही नहीं। अंग्रेजी परकोटे या अंग्रेजी बैनेटों पर आक्रमण करना छोड़ कोई भी दुष्कर कृत्य करने में सिपाही आगे रहते हैं, कुंवर सिंह यह लखनऊ के उदाहरण से जान गया था। इसलिए आजमगढ़ शहर को नियंत्रण में रखकर और वहां के अंग्रेजों को मुंह बाहर निकलना असंभव बना वह अपने मन में एक दूसरा ही साहसी दांव बनाने लगा। सन् 1857 में रण-मैदान में उतरे हजारों योद्धाओं में हमेशा दो वर्ग दिखाई देते थे। एक स्वतंत्रता के तेज के दिव्य उत्साह को शोभा दे, ऐसे, सीने से सीना टकरा जाए तब भी अटल समर करनेवाले और दूसरे अनुशासनहीन, हौंसला छोड़ देने वाले। कुंवर ने अपनी सेना में से पहले क्रम के प्राण पर प्राण देनेवाले ऐसे कड़े लोग चुनकर उनका एक विशेष पथक बनाया। सन् 1857 में अन्य किसी भी सेनानी द्वारा प्रयोग नहीं की हुई युक्ति सिद्ध करते ही कुंवर सिंह ने ऊपर बताई अपनी साहसी योजना को प्रत्यक्ष रूप देते को कमर कसी और आजमगढ़ के पास की नदी पर अपनी यह चुनी हुई सैनिक टुकड़ी खड़ी कर दी। इस पुल के सामने से सर ल्यूगार्ड नामक एक जनरल सबल अंग्रेजी सेना के 1857 का स्वातंत्र्य समर - 337