१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसाथ आजमगढ़ पर चढ़ा आ रहा था। इस जनरल को लगा कि आजमगढ़ का कब्जा न छोड़ना पड़े, इसी हेतु से कुंवर सिंह कीसेना उस पुल पर मुझे रोके खड़ी है। "अंग्रेज जनरल ही नहीं, उसके निकट के लोगों को भी उस षड्यंत्रकारी राजपूत के मन में क्या दांव चल रहा है, यह समझ में नहीं आ रहा था।”152 वह दांव था अंग्रेजों को वहीं उलझाकर अपनी सेना के साथ तुरंत जगदीशपुर चले जाना। यह युक्ति, युद्ध-कौशल और युद्ध धैर्य का उत्कर्ष थी। आजमगढ़ा से गाजीपुर पहुंचकर वहां से गंगा नदी का पाट सेना सहित उतरकर जगदीशपुर जीतना और वह भी पीछे ल्यूगार्ड की अंग्रेजी सेना और आगे आरा की अंग्रेजी सेना-इन दोनों को चकमा देकर! इस साहसी योजना को सिद्ध करने के लिए उस पुल पर उस राजपूत ने अपने अति उत्तम लोग रखे थे। उस सेना को उस पुल पर ल्यूगार्ड को इतनी देर तक ठहराना था कि आजमगढ़ के सात-आठ हजार क्रांतिकारी सैनिक उस शहर का चक्कर काटकर वह शहर पीछे छोड़, सीधे गाजीपुर के रास्ते पर सकुशल लग सकें। गंगा उतरकर एक बार जगदीशपुर के वन में जगदीशपुर का सिंह घुस जाए तो रणक्रीड़ा की नई पहल, नवराज्य का नया प्रारंभ हो जाए। यह सारा साहसी प्रयास सिद्ध होना, इस तानू नदी के पुल पर के हे सैनिकों! पूरी तरह तुम्हारी शूरता पर अवलंबित है! कुंवर सिंह का सारी सेना आजमगढ़ छोड़कर शत्रु के निशाने से पूरी तरह बाहर निकलने तक तुम इस पुल पर सर ल्यूगार्ड को पैर मत रखने देना। इस अटल समर के लिए तुम ही योग्य हो, इसलिए हजारों योद्धाओं में से तुम्हारे उस नायक ने तुम्हारा चुनाव किया है। उसके विश्वास को तुम्हारी शूरता सत्पात्रता दिलवाएं एक विचार, एक संकल्प, एक प्रतिज्ञा है कि आजमगढ़ के हजारों बंधु पार निकल गए होने का संकेत मिलने के पूर्व यह पुल छोड़ना नहीं है। अंग्रेजों जैसी सबल सेना तोपों के साथ आगे ीिड़ी है तब भी पुल छोड़ना नहीं है। सारे-के-सारे मर जाने तक पुल छोड़ना नहीं है। कुंवर लड़ते-लड़ते मर जाएं, फिर भी पुल नहीं छोड़ना। "पुनर्जन्म लेकर फिर लड़ना!” श्री शिवराज किले तक पहुंचने के पूर्व बाजी देशपांडे पावन घाटी में जैसे लड़ा वैसे स्वदेश की अतुल पांडेगिरी स्वराज्य की इस बाजी के लिए आज इस पुल को भी पावन करो। अफजल खां की सेना ने जैसे उस इतिहास-प्रसिद्ध घाटी के मुट्ठी भर मराठों पर हमले क बाद हमले किए वैसे ही इस पुल के ऊपर कुंवर सिंह की छोटी सी सेना पर ब्रिटिश सेनानी ल्यूगार्ड भी हमले-पर-हमले करता रहा। पर उस पुल पर उसका पांव न टिक पाता। मानो हमले की हर गेंद पांडे पक्ष द्वारा रोकी जाने पर उतने ही वेग से वापस लौट जाती हो। आजमगढ़ के सारे विद्रोही गाजीपुर के रास्ते पर निकल चुकने का संकेत आने तक वह स्देशाभिमानी पुल ऐसे प्रतिहत बल से लड़ता रहा। मैलसन लिखता है-'रण में धैर्य रखनेवाले वीरों के 1857 का स्वातंत्र्य समर – 338 152 1. मैलसन, खंड 4, पृष्ठ 330 ।