१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
पृष्ठ 346, कुल 418 में से
संदर्भ में पढ़ेंजमींदार था। फिर भी स्वतंत्रता का यह महायज्ञ शुरू हो जाने के बाद से नरपत सिंह ने उसी की स्थंडिल पर अपना सर्वस्व अर्पण किया था। आज उसपर एक जाज्वल्य तोपखाने के साथ प्रचंड अंग्रेजी सेना ने हमला किया है। उसके पास किले में सौ-डेढ़ सौ लोग भी नहीं थे। फिर किला खाली कर विद्रोही बिना शर्त समर्पण करेंगे ही, अंग्रेजों को यह विश्वास होने लगा। पर उस दिन प्रातः नरपत सिंह की कैद से एक यूरोपियन छूटकर आया। उसने अंग्रेजों को बताया कि नरपत सिंह कहता है, “किला खाली करेंगे, पर रण में चार हाथ कर लेने के बाद।” रण में? यह विद्रोही नरपत हमें रण में हाथ दिखाएगा? और फिर किला खाली करेगा? वालपोल ने कहा, “उसे उसके किले सहित उसी जगह पर गाड़ डालें, चलों!” सदैव की भांति अंग्रेजी सेना ने खबर फैलाई कि किले में दो-तीन सौ नहीं, पंद्रह सौ लोग हैं! नरपत को हम अवश्य मसल देंगे, जबकि उसकी सेना हमसे बहुत भारी है। यह समाचार फैलाने के पहले उसे जीतने में गौरव ही क्या? इसलिए वालपोल ने भी कहा, “ठीक है, नरपत पंद्रह सौ सैनिक होने के कारण ही ऐसे उद्धत बोल बोल रहा होगा। किले में कैद रहे युरोपियन ने जो प्रत्यक्ष देखा कि डेढ़ सौ लोग हैं वह केवल ठोकी होगी।” किले पर सेना चलने लगी और वह भी किले के किसी दुर्बल गिरे हुए भाग की ओर नहीं, सामने की मजबूत दीवार पर। किले के सामने की झाड़ी से यह अंग्रेजी सेना घुसते देखकर नरपत के मजबूत योद्धा गोलियां चलाने लगे। अंग्रेजों के खंदक से भिड़ते ही मारा-मारी बहुत हुई। काफे के एक सौ बीस लोगों में से छियालीस लोग वहीं-के-वहीं मारे गए। काफे पीछे हटा। उधर ग्रूव को भी विद्रोहियों ने उसकी जगह पर ही मरने के लिए बांधे वालपोल अपनी तोपें लेकर खंडहर पार्श्व से आता यह अकल्पित संकट देखनेवाला योद्धा वालपोल अपनी तोपें लेकर खंडहर बाजू की ओर गया। और उसने तोपें इतनी कुशलता से चलवाई कि अंग्रेजी सेना का इस ओर गया। और उसने तोपें इतनी कुशलता से चलवाई कि अंग्रेजी सेना का इस ओर से दागा हुआ गोला किले का लांघकर दूसरी ओर विद्रोहियों की सेना के ऊपर जाकर गिरता। केवल शत्रु से लड़नेवाले सेनानी बहुत हुए और होंगे, पर शत्रु और स्वयं से समान वीरता से लड़नेवाला सव्यसाची वीर वालपोल के सिवाए दूसरा नहीं मिलना। वालपोल का समर चातुर्य देखकर अंग्रेज योद्धा होप उस रणक्षेत्र में अंग्रेजी पक्ष संवारने आया तो वह भी मारा गया। विद्रोहियों की मार से ग्रूव भी पीछे हटने लगा। इधर-उधर त्राहिमाम। बुरी तरह भ्रम में पड़ी अंग्रेजी सेना उन ढाई सौ विद्रोहियों के धिक्कार के साथ रण छोड़कर चली गई। होप जैसा योद्धा बलि चढ़ गया, यह सुनकर इधर-उधर हाहाकार मच गया। लॉर्ड केनिंग, सर कोलिन, सारा इंग्लैंड शोक-विह्वल हो गया। हजारों अंग्रेज लोग मरे होते तो भी इतना दुःखी न होता जितना उस लोकप्रिय होप की मृत्यु से इंग्लैंड देश दुःखी हो गया। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 351