१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअंग्रेजी सेना की पूर्ण पराजय और होप की मृत्यु! उस बहादुर नरपत सिंह ने अपनी कही सच करके दिखाई। रण में शत्रु को हाथ दिखाऊंगा। अपने ढाई सौ अनुयायियों के साथ उसने वह किला तुरंत छोड़ दिया। अपनी इन अलग-अलग अंग्रेजी सेनाओं से अवध के सारे विद्रोहियों को रूहेलखंड में दबोचते ले जाने पर अपनी अलग-अलग सेना इकट्ठी करके कमांडर-इन-चीफ सर कोलिन रुहेलखंड की ओर चला। अवध से भगाए गए विद्रोही नेता शाहजहांपुर में इकट्ठा हो गए थे। वहीं मौलवी अहमद शाह भी थे। इस जोड़ी को पकड़ने के लिए सर कोलिन ने आज तक कितनी ही बार दीर्घ प्रयास किए थे, परंतु वे दोनों ही अभी तक अजित-के-अजित बने रहे। अतः वे रूहेलखंड में शाहजहांपुर में इकट्ठा हैं, यह समझते ही सर कोलिन ने बहुत परिश्रम से उस शहर को घेरने का प्रयास किया और वे दोनों प्रथित पुरूष बस हाथ में आ ही गए हैं, ऐसा समझक रवह 30 अप्रैल को शाहजहांपुर से आ तो भिड़ा, पर उन दोनों पंछियों के उड़ जाने के बाद। सर कोलिन का मन विषाद से भर गया। उसने चारों दिशाओं से चार सेनाएं शाहजहांपुर और बरेली भेजी थीं और उसे विश्वास था कि उसके जाल से एक भी विद्रोही छूटेगा नहीं। परंतु वस्तुस्थिति यह थी कि अति प्रबल विद्रोही उस जाल से निकलकर पार हो गया और वह भी स्वयं कमांडर-इन-चीफ की डोरी को झटका देकर। मौलवी और नाना तो भाग ही गए, परंतु अब बरेली का दांव भी असफल न हो। जाए, इसलिए शाहजहांपुर में चार तोपों के साथ एक अंग्रेजी सेना रखकर उदास कमांडर-इन-चीफ बरेली के लिए चला और 4 मई को एक दिन के अंतर पर आकर उतरा। बरेली में खानबहादुर खान अभी तक राज्य कर रहे थे। दिल्ली और लखनऊ हार जाने पर निराधार हुए विद्रोहियों के नेता इसी स्वतंत्र राजधानी में आकर रह रहे थे। दिल्ली के राजवंश का रणकुशल राजपुत्र मिर्जा फीरोजशाह, श्रीमंत नाना साहब, मौलवी अहमद शाह, राजा तेजसिंह और अन्य कितने ही नेता खानबहादुर खान के अभी तक स्वतंत्र इस राज्य में घुसे होने से बरेली शहर पर अंग्रेजों की बड़ी आंख थी। पर ख ानबहादुर खान और तत्पक्षीय नेताओं का उस शहर में यों ही दृढ़ता से लड़ते रहने की अपेक्षा एक-दो-हाथ होते ही छोड़कर पहले की गई प्रख्यात घोषण के अनुसार प्रदेश में धींगामुश्ती करने का विचार निश्चित था। अंग्रेजी सेना एक दिन की दूरी पर आते ही बरेली में अपने को बंद करने के अंग्रेजी प्रयास विफल करने के लिए शहर छोड़ने की तैयारी करके उन्होंने बाहर जाने का रास्ता रोके रखा। परंतु फिरंगी शत्रु को एक तगड़ा झापड़ लगाने के पूर्व और अपना रण कर्तव्य कुछ तो भी पूरा किए गिना बाहर निकलने को वह तेजस्वी के पूर्व और अपना रण कर्तव्य कुछ तो भी पूरा किए बिना बाहर निकलने को वह तेजस्वी रक्त तैयार नहीं था। इसलिए 4 मई को वे अंग्रेजों का सामना करने रण में उतरे। इस रणभूमि में जो अंग्रेजी सेना थी वह अभूतपूर्व थी और प्रबल थी। उनका 1857 का स्वातंत्र्य समर – 352