१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभयंकर बड़ा तोपखाना, उनकी उत्कृष्ट घुड़सवार सेना, अनुशासित पैदल सेना और इस बहुसंख्य तीक्ष्ण सेना पर स्वयं सर कोलिन का सेनापतित्व! इस सेना पर खानबहादुर की तोपों का कोई प्रभाव नहीं हुआ, वे बरेली पर बिना रुके चढ़ते चले आए। 5 मई को तोपें छोड़कर विद्रोहियों ने तलवार निकाली। विजय की कोई आशा न होते हुए भी या यूं कहें, वैसी आशा नहीं थी, तभी तो रण-मैदान से वापस न लौटकर हंसते-हंसते मृत्यु का आलिंगन करनेवाले भयंकर गाजी की यह तलवार थी। किसी भी धर्मयुद्ध में शत्रु का प्राण लेना या लेते हुए मरना माने स्वर्ग के दरवाजे धड़ाधड़ खुलवाना होता है, यह जिसकी दृढ़मल अनिवार्य श्रद्धा है, यह उन धर्मवीरों की तलवार थी। किसी भी धर्मयुद्ध में शत्रु का प्राण लेना या लेते हुए मरना माने स्वर्ग के दरवाजे धड़ाधड़ खुलवाना होता है, यह जिसकी दृढ़मूल अनिवार्य श्रद्धा है, यह उन धर्मवीरों की तलवार थी। वही तलवार खींच ये गाजी लोग अकस्मात् अंग्रेजी सेना पर टूट पड़े। दाढ़ी के बाल बढ़े हुए, हरे साफे सिर पर बंधे, कमरबंद कसा हुआ, अंगुली में चांदी की चपटी मुद्रा और उसपर कुरान के धर्म वाक्य खुदे हुए, ऐसे भव्याकृति वीर दाहिनी ओर तीर की तरह घुसे और अंग्रेजी सेना पर टूट पड़े। अपनी ढाल साधे और तलवारें सूर्यप्रकाश में चमकाते ‘दीन-दीन’ की गर्जना के साथ नाचते वे शत्रु पर टूटे। उनके टूटते ही अंग्रेजी सेना झटके से पीछे हट गई। 42वें हायलैंडर्स आगे आए। उनपर यह वज्राघात हुआ। उन्होंने तेजी से फिरंगियों को काटना शुरू किया। उनके कुछ लोग आगे घुसे और अंग्रेज पीछे चले गए। गाजियों की टोली में से एक भी पीछे नहीं लौटा। मारते, छांटते, काटते उनमें से हर एक जहां लड़ा वहीं कटा। एक अवश्य काटे जाने के पहले रण में गिर गया, क्यों? रूको, एक क्षण पूछो, नहीं-यह देखो, उधर से अंग्रेजी कमांडर-इन-चीफ एकदम पास आ गया। उसे देखते ही मरने का नाटक करके सोया यह आदमी शेर की भांति झपटकर उछला। पर पास के एक तैयार सिख ने उसकी गर्दन तत्काल अलग कर दी। विश्व इतिहास में अप्रतिम साहस, ध्येय-निष्ठा, शहादत और मृत्युंजयता के जितने भी उदाहरण होंगे उनमें से कोई उदाहरण बरेली के इस स्वातंत्र्य समर के गाजियों में से भी नहीं होगा। दूसरे दिन सर कोलिन का जाल तोड़-ताड़ खानबहादुर खान सेना सहित बरेली से बाहर निकले और 7 मई को अंग्रेजों ने बरेली पर कब्जा कर लिया। खानबहादुर खान ने रण-चपलता में अपने दांव-पेच विफल कर दिए। इससे उदास होकर कमांडर-इन-चीफ बरेली में प्रवेश कर ही रहा था तभी उसके और सारी अंग्रेजी सेना के बीच एकाएक मौलवी! मौलवी! ऐसी आश्चर्यजनक कानाफूसी प्रारंभ हो गई। हां, आश्चर्यचकित करनेवाला ही एक दांव उधर शाहजहांपुर की ओर मौलवी ने डाला था। सर कोलिन को पूरी तरह छकाकर मौलवी और नाना साहब जो सटके वे केवल लड़ाई टालने के लिए ही नहीं सटके थे। शाहजहांपुर से निकलने के पूर्व-नाना 1857 का स्वातंत्र्य समर – 353