भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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मेरा यह कथन सफल नहीं होगा तब उसने अपने महावत को आदेश दिया कि दीवार का द्वार तोड़ने के लिए हाथी को आगे बढ़ाया जाए। जिसपर वह बैठा था उसी विशाल हाथी का मस्तक उस प्राचीर के द्वार पर धड़ाधड़ टकराने लगा। और एक टक्कर कि उस दरवाजे का निश्चित ही चूरा हो जाएगा। उसी समय राजा के भाई ने बंदूक चलाई और उसकी गोली ने मौलवी अहमद शाह ! मौलवी अहमद शाह को उस परकोटे पर खड़े एक हिंदुस्थानी कुलांगार ने गोली चलाकर मार डाला। तुरंत ही वे दोनों भाई परकोटे के बाहर आए और उन्होंने मौलवी का सिर गरदन से उतार लिया। उस सिर को एक रूमाल में बांधा और वे तेरह मील दूर स्थित शाहजहांपुर दौड़ते गए। अंग्रेज अधिकारी खाना खा रहा था, तभी वह राजा अंदर घुसा। उसने अपने हाथ का रूमाल खोला और रक्त से सने मौलवी के सिर को उसने अंग्रेज के पैरों के पास लुढ़का दिया। दूसरे दिन अंग्रेजों ने शहर कोतवाली पर वह सिर टांग दिया और इस बहादुरी के लिए पोवेन के राजा का पचास हजार रूपए पुरस्कार दिए। पोवेन के राजा ! पोवेन के चांडाल ! तेरे देशद्रोह से यदि सचमुच तन-बदन में आग लगती हो तो इस प्राणी की प्रतिमा हर घर में नरक कूप के दरवाजे टांगी जाए। मौलवी अहमद शाह ऊंचा, इकहरा, कसा हुआ, भारतभूमि के हाथ की किसी सतेज तलवार जैसा था। उसकी नाक सीधी, भौंहें कमान जैसी। उसके मरते ही अंग्रेजों ने कहा, "उत्तर भारत का ब्रिटिशों का भयंकर शत्रु समाप्त हुआ।" अंग्रेजों के इस भयानक शत्रु के संबंध में अंग्रेजी इतिहासकार मैलसर कहता है-'उसके सैन्य नेतृत्व और युद्ध-चातुर्य के विद्रोह में अनेक उदाहरण घटित हुए हैं। उसके अंतिम समय के दावं-पेच तो अप्रतिम थे। सर कोलिन को दो बार भग्नचातुर्य कर बिखेर देने का सम्मान उसके सिवाय अन्य किसी को भी प्राप्त होना असंभव था। इस तरह फैजाबाद का यह मौलवी अहमद शाह रण में चमका। अपने जन्मसिद्ध देश की अन्याय से छीनी हुई स्वतंत्रता वापस लेने जो पुरूष विद्रोही संगठन खड़ा कर युद्ध करता है, वह यदि देशभक्त कहलाता है तो मौलवी अहमद शाह वास्तव में ऐसा ही देशभक्त था ! खून से उसकी तलवार गंदी नहीं हुई, खून के लिए वह सहमत नहीं था। जिसने उसका स्वदेश छीना था उस उचक्के विदेशी से वह लड़ा। वीरोचित लड़ा। रणनीति से लड़ा। दृढ़ता से लड़ा और इसलिए उस लोकोत्तर की स्मृति सारे राष्ट्र के रणवीरों और सत्यप्रियों के आदर की सत्पात्र हो गई थी। "158 1857 का स्वातंत्र्य समर - 356 158 "मौलवी एक असाधारण व्यक्ति था। विद्रोह काल में उसके सैनिक नेतृत्व की योग्यता का परिचय कई प्रसंगों में मिलता है। ' ' 'सर कैंपबेल को दो बार रण में मुंह की खिलाने का साहस दूसरा कोई नहीं कर सकता।" -मैलसन कृत-'इंडियन म्यूटिनी', खंड 4, पृष्ठ 380