भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 352, कुल 418 में से

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प्रकरण-10 रानी लक्ष्मीबाई जिन राजाओं ने अपने पीछे राज्य का कोई उत्तराधिकारी नहीं छोड़ा था, उनका राज्य ईस्ट इंडिया कंपनी में मिलाने की नीति लॉर्ड डलहौजी ने अपनाई। डलहौजी की इस अपहरण नीति के अंतर्गत गोद लेकर उत्तराधिकारी बनाने का अधिकार भी नहीं दिया गया था। यही बात झांसी के लिए थी। झांसी राज्य भी अंग्रेजों ने हथियाना चाहा। विधवा रानी लक्ष्मीबाई ने विरोध के स्वर में कड़ककर कहा, " क्या मैं झांसी छोड़ूं? नहीं छोडूंगी। किसी की हिम्मत हो तो आजमा ले। मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी। झांसी की लक्ष्मी के कंठ से स्वातंत्र्य-कौस्तुभ मणि छीनने का साहस किसमें था? इस समय संपूर्ण दैत्य-दानव एकत्र होकर आएं-साक्षात् मृत्युदेव यमराज भी लक्ष्मीबाई से युद्ध करके झांसी लेना चाहें तो भी झांसी उन्हें नहीं मिल सकती। जब तक लक्ष्मीबाई के अंदर रक्त की एक बूंद भी शेष रहेगी तब तक उसकी स्वातंत्र्य-कौस्तुभ मणि उसके कंठ में ही शोभा पाएगी और उसकी धधकती ज्वाला मेमं देशद्रोही, अंग्रेज नराधम जलकर भस्म होंगे। झांसी, झांसी का राजप्रासाद, जरीपटका (मराठी कपड़ा), राजसिंहासन, उसका सतीत्व आदि सब झांसी की रानी लक्ष्मी के साथ स्वाधीन रहेंगे या स्वाधीनता की यज्ञाग्नि में भस्म हो जाएंगे। अपनी बुलंद आवाज 'नहीं, मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी। जिसकी हिम्मत हो तो आजमा 1857 का स्वातंत्र्य समर - 357

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