१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंले।' के साथ वीरांगना लक्ष्मीबाई अंग्रेजों से लोहा लेने को तत्पर हो गई। संपूर्ण बुंदेलखंड में आगामी क्रांति के लक्षण दिखाई देने लगे। सागर, नौगांव, बांदा, बानापुर, शाहगढ़ और कालपी में प्रतिशोध की भयंकर अग्नि प्रज्वलित होने लगी। अब तक झांसी की स्वतंत्रता अक्षुण्ण रही । झांसी की प्रजा शांत, सुखी और व्यवस्थित रही; किंतु डलहौजी ने स्वतंत्रता की उस मणि को अपहृत किया, पर लक्ष्मी ने मणि को उससे छीन लिया और विजय गर्व से राज्य-संचालन करती रही। कमलासना लक्ष्मी अब युद्ध देवी के रूप में शोभा पा रही थी। अब उसके युद्धोचित वेश से आंखें चौंधिया जाती थी। नखशिख तक वह शस्त्रों, युद्धोभूषणों से सजी थी। इन दिनों रानी की दिनचर्या इस प्रकार बताई गई है-? ‘प्रातः पांच बजे से जागकर इत्र से सुगंधित जल से स्नान करती थीं। उसके बाद वस्त्र धारण करती थीं। साधारण तथा सफेद चंदेरी साड़ी उन्हें पसंद थी। तदनंतर पूजा पर बैठ जातीं। विधवा होते हुए भी प्रायश्चित्तर्घ्य देतीं, तुलसी वृंदावन में तुलसी की पूजा करती। उसके बाद पार्थिव पूजा होती। दरबारी संगीतज्ञ साम गायन करते। फिर कथावाचक कथा सुनाते। समाप्ति पर मांडलिक सरदार वंदना करते। दरबार के समय साढ़े सात सौ दरबारियों में जब कोई अनुपस्थित रहने का कारण पूछतीं। पूजा-पाठ के बाद प्रातराश (नाश्ता) करती। विशेष जल्दी का कार्य न होता तो नाश्ते के बाद एक घंटे आराम करतीं। उसके बाद भेंट में आए उपहार चांदी के थालों में रखे, रेशमी वस्त्रों से ढके उनके सामने पेश किए जाते। उनमें पसंद की वस्तुओं को स्वीकार करतीं, जो न स्वीकार करतीं, वे नौकरों में वितरित करने के लिए कोठीवालों को दी जातीं। अपराह्न तीन बजे पुरूष वेश में दरबार में जातीं। उस समय की वेशभूषा होती-पाजामा, गहरे नीले रंग का कोट, सिर पर टोप और उसपर सुंदर सी पगड़ी बांधती-बूटे का काम किया हुआ दुपट्टा पतली कमर में बांधती, जिसमें रत्नजटित तलवार लटकती। इस वेश में वह साक्षात् गौरी मालूम देती थीं। पुरुष वेश के अतिरिक्त कभी-कभी स्त्री वेश के भी वस्त्र पहनतीं। विधवा होने के बाद सौभाग्य अलंकरण-नथनी आदि-वह धारण नहीं करती थीं। कलाई में हीरे की चूड़ियां, गले में मोतियों का हार और कनिष्ठा उंगली में हीरे की अंगूठी रहती। बालों का जूड़ा बांधती। सफेद साड़ी और सफेद कंचुकी पहनतीं। इस प्रकार दरबार में कभी पुरूष वेश, कभी स्त्री वेश में बैठतीं। दरबारी लोग उन्हें प्रत्यक्ष नहीं देख पाते थे। उनका कक्ष अलग होता था, जिसका दरवाजा दरबार में खुलता था। सोने के बेलबूटों से सज्जित द्वार पर सोने-चांदी के आवरण में लिपटे दो दंड धारण किए दो वेत्रधारी खड़े रहते; दीवान लक्ष्मणराव उस कमरे के सम्मुख महत्त्वपूर्ण कागजों को लेकर खड़े रहते और उनके पास दरबार का अमात्य बैठता। ‘रानी बुद्धिमान थीं। बात के मर्म को शीघ्र ही ताड़ लेतीं। उनके निर्णय स्पष्ट, संक्षिप्त और निश्चित रहते। कभी-कभी वे अपने हाथ से आज्ञाएं लिखतीं। न्याय के समय वे बहुत 1857 का स्वातंत्र्य समर - 358