भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 354, कुल 418 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 354

सावधान रहतीं। मुलकी तथा फौजदारी के निर्णय बड़ी योग्यता के साथ करतीं। “बड़े भक्तिभाव से वे महालक्ष्मी के दर्शन करने जातीं। यह मंदिर एक तालाब के किनारे था, जिसमें सुंदर कमल खिले रहते। हर मंगलवार तथा शुक्रवार को मंदिर जातीं। एक बार मंदिर से लौटकर रानी दक्षिणी दरवाजे से आ रही थीं। वहां हजारों भिखारी रास्ता रोककर खड़े थे। रानी ने मंत्री लक्ष्मणराव पांडे से कारण जानना चाहा। मंत्री ने बताया कि ये लोग अत्यंत गरीब हैं। जाड़े से परेशान हैं। रानी साहिबा से मदद मांगते हैं। दयालु रानी बहुत दुःखी हुईं। आज्ञा दी गई। चौथे दिन एक-एक कुरता, टोपी और कंबल सभी भिखारी तथा गरीबों को इकट्ठा करके रानी ने अपने हाथ से बांटा। नत्थे खां के साथ की लड़ाई में घायलों के घाव धोने के कार्य के लिए रानी हठ करतीं, अपने दुःख में रानी की ऐसी रूचि देखकर उनके घाव अच्छे हो जाते। मंदिर जाते यमय रानी की शोभा देखते ही बनती। कभी पालकी में तो कभी घोड़ें पर बैठकर जातीं। पुरूष वेश में साफे का छोर पीठ पर लहराकर शोभा पाता था। उनके आगे राजध्वज मारू बाजे के साथ चलता था। इस ध्वज के पीछे दो सौ गोरे घुड़सवार रहते। रानी के आगे-पीछे सौ-सौ सवार चलते, कभी सारी सेना जुलूस में रानी के साथ होती। रानी के निकलते ही नगाड़ा और शहनाई बजने लगते।”¹⁵⁹ अब स्वराज्य का नगाड़ा गंभीर घोष कर रहा था। ग्यारह महीने से गूंजनेवाले इस स्वातंत्र्य घोष से संपूर्ण बुंदेलखंड भर गया था। नगाड़े के इस नाद का साथ कालपी से तात्या टोपे की तोपें दे रही थीं। ब्रिध्य से यमुना तक ब्रिटिश सत्ता का कोई चिह्न दिखाई नहीं दे रहा था। कोई उसका-अंग्रेजी राज का-नाम भी नहीं ले रहा था। अब तो ब्राह्मण, मौलवी, सरदार, जागीरदार, सैनिक, पुलिस, राजा, राव, साहूकार और देहाती सभी की एक ही मांग थी, एक ही चाह थी-स्वाधीनता-प्राप्ति। इन सबको एक सूत्र में पिरोने का कार्य लक्ष्मीबाई ने किया। उनकी आवाज में वही दृढ़ता थी-‘अपनी झांसी मैं नहीं दूंगी˙˙˙'। संसार के सामने दृढ़तापूर्वक कहा गया ‘नहीं’ शब्द बहुत कम आया है। भारत के उदारमना लोगों के मुंह स`अब तक यही एक शब्द सुनाई देता आया है, “मैं दूंगा।” किंतु लक्ष्मीबाई ने यह विलक्षण जयघोष किया-‘मैं नहीं दूंगी।' काश, यह आवाज भारत के हर मुख से गूंजी होती! इसी समय सर हू रोज पांच हजार सैनिकों को लेकर विद्रोहियों को दबाने झांसी की ओर चल पड़ा। सन् 1857 के प्रारंभ में हिमालय से विंध्य तक के समूचे प्रदेश को जीतने की सैनिक योजना पुनः बनाई। यह प्रदेश दो हिस्सों में बांटा गया। प्रत्येक पर अधिकार करने के लिए सेना भेजी गई। सर कैंपबेल इलाहाबाद से गंगा-यमुना के उत्तर की ओर अपनी बड़ी सेनाके साथ बढ़ा; दोआब जीता, गंगा पार कर लखनऊ को नष्ट-भ्रष्ट 1857 का स्वातंत्र्य समर – 359 159 1. दत्तात्रेय बलवंत पारसनी कृत-‘रानी लक्ष्मीबाई का जीवनचरित', पृष्ठ 147-51 ।

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर) · पृष्ठ 354, कुल 418 में से · BharatKosha