भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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किया, बिहार के विद्रोह को दबाया, बनारस के आसपास तथा अवध के बागियों को हराया, सब क्रांतिकारियों को-रूहैलखंड में जहां अंतिम मुठभेड़ हुई-भगाया, उत्तर प्रदेश को क्रांतिकारियों से मुक्त किया। इस सब बातों का उल्लेख पिछले अध्यायों में आ चुका है। जहां कैंपबेल यमुना से उत्तर में हिमालय की ओर बढ़ रहा था, वहां यमुना से दक्षिण में विंध्य तक का प्रदेश जीतने ह्यू रोज आगे बढ़ा। सिखों,, गोरखों तथा कुछ हिंदुस्थानी सैनिकों ने कैंपबेल की सहायता की। ह्यू रोज को विशेष रूप से मद्रास, बंबई तथा हैदराबाद की पलटनों की सहायता मिली। हिंदुस्थानी सैनिकों का सहयोग भी ह्यू रोज को मिला था। सच तो यह है कि मात्र अपनी शक्ति से विजय पाना अंग्रेजों के लिए असंभव था। दक्षिणी भाग को जीतने के लिए हिंदी सेना को दो हिस्सों में बांटा गया। एक भाग ब्रिगेडियर विटलॉक के अधीन रखा गया, जो जबलपुर से आगे बढ़कर मार्ग के सब प्रदेशों को जीतता हुआ ह्यू रोज से मिला। दूसरा भाग ह्यू रोज के ही अधीन था। योजना थी कि जब जबलपुर से विटलॉक चलेगा तभी वह मऊ से प्रस्थान करेगा और झांसी तथा कालपी होकर आगे बढ़ेगा। योजना के अनुसार 6 जनवरी, 1857 को ह्यू रोज मऊ से निकला। एक छोटी लड़ाई करके उसने रायगढ़ जीता। वहां से सागर गया। क्रांतिकारियों द्वारा बंदी बनाए गए गोरों को मुक्त कराया और दक्षिण जाकर 10 मार्च को बानापुर जीत लिया तथा चंदेरी का प्रसिद्ध किला भी जीत लिया। झांसी से चौदह मील की दूरी पर 20 मार्च को इस विजयी सेना ने डेरा डाला। इन मुठभेड़ों के कारण नर्मदा के उत्तर में देश भर में फैले क्रांतिकारी दस्तों की झांसी में भीड़ थी। इसीलिए रोज क्रांतिकारियों के अड्डे को नष्ट-भ्रष्ट करने झांसी की ओर चल पड़ा। इसी बीच लॉर्ड केनिंग तथा कैंपबेल ने उसे आज्ञा दी कि पहले वह चरखारी नरेश की सहायता करे, क्योंकि वह तात्या टोपे से घिरा था। लेकिन वह इस बात को मानता तो झांसी को नष्ट करने का उसका इरादा ही नष्ट हो जाता। बड़ी द्विविधा में था। परिस्थिति विकट थी। झांसी पर चढ़ाई करने में अंग्रेजी शासन का हित था। अतः इस हित को ही सर्वोपरि मान रॉबर्ट हैमिल्टन ने दोनों अधिकारियों की आज्ञा के उल्लंघन का अपराध अपने ऊपर ले लिया और अंग्रेजी राज के हित को ध्यान में रखकर झांसी पर चढ़ाई कर दी। किंतु झांसी की भूमि में पैठते ही उसे बड़े कष्ट उठाने पड़े। रानी लक्ष्मीबाई ने अपनी आज्ञा से आसपास का क्षेत्र उजड़वा दिया था, ताकि शत्रु को रसद न प्राप्त हो सके। न छाया के लिए पेड़ रहे, न खेतों में एक भी भुट्टा रहा; यहां तक कि घास का एक तृण भी नहीं छोड़ा था। जिस प्रकार नीदरलैंड के विलियम ऑफ ऑरेंज ने स्पेनवाले शत्रु के हाथ में देश जाने की अपेक्षा सागर के पानी को अंदर लेना ज्यादा पसंद किया, झांसी की रानी ने भी उसी नीति का अनुसरण किया। 1857 का स्वातंत्र्य समर – 360