भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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रानी के स्वर में वही कठोरता, वही गर्जना है। बानापुर का राजा मर्दान सिंह क्रोध से उन्मत्त है, शाहगढ़ का राजा शूर ठाकुर जान हथेली पर लिये है, बुंदेलखंड के सरदार, देश की आजादी के लिए अड़े उनके अनुयायी-ये सभी प्रतिशोध की अग्नि में धधक रहे थे। राजध्वज 'जरीपटका' क्रोध की ज्वाला की तरह ऊपर उठ रहे हैं। इन सब शक्तियों का केंद्रीभूत रानी ही हैं। स्वराज्य की साक्षात् मूर्ति, जो दुर्गा की अवतार हैं। उजाड़ भूमि में से भूख-प्यास का कष्ट उठाती हुई अंग्रेज सेना झांसी की ओर बढ़ रही है। धिक्कार है शिंदे तथा टिहरी नरेश को, जिन्होंने 'अंग्रेज निष्ठा' के कारण इस लड़ाई में सारी सेना को घास, ईंधन और फल-मेवों से भरपूर सहायता की।160 शिंदे और टिहरी नरेश अंग्रेजों की सहायता कर रहे हैं। विश्वासघात और देशद्रोह का बोलबाला है। अब तुम्हारी विजय के आसार नहीं दिखाई देते। तो फिर क्यों न अंग्रेजों की शरण में जाकर सर्वनाश से बचतीं? पर क्या झांसी की रानी के मन में देशद्रोहियों, विश्वासघातियों के प्रबल जोर के कारण यह बात आएगी? क्या शरण लेने पर रानी ही क्या, महामंत्री लक्ष्मणराव, मोरोपंत, शूर ठाकुर, सरदार तथा सभी वीर बच जाएंगे। पर इनके स्वर-में-स्वर मिलाकर पूरी झांसी का उत्तर था- 'जातस्य कि ध्रुवो मृत्युः ˙˙संभावितस्य चाऽकीर्ति मरिणादतिरिच्यते'-अर्थात् जो जन्म पाता है वह अवश्य मरता है, तो फिर व्यर्थ में कीर्ति को क्यों कलंकित किया जाए? सो देश की आन-बान की रक्षा के लिए अंग्रेजों से लड़ना निश्चित रहा। झांसी की सेना अपनी रानी के साथ युद्ध की तैयारी में निमग्न हो गई। उसकी सेना में वीरों की कमी नहीं थी, पर कुशल, शिक्षित सैनिक कम थे। अनुशासन का भी अभाव था। फिर भी रानी ने संपूर्ण सेना का नेतृत्व किया। वह हर बुर्ज पर, हर द्वारा पर घूमती हुई नजर आती थीं। तोपों की कुरसियां बनने और उन्हें मोरचे पर लगाने की जगह वह स्वयं उपस्थित रहतीं। चतुर तोपचियों का चुनाव करने में वह संलग्न थीं। इधर-उधर घूमकर निराश हृदयों में उत्साह का संचार कर रही थीं। इधर झांसी की जनता में भी पूरा उत्साह था। झांसी के पंडित मंदिरों में स्वाधीनता के लिए प्रार्थनाएं कर रहे थे। पुजारियों ने रण में जानेवाले सैनिकों को आर्शीवाद दिए और घायल होने पर उनकी शुश्रूषा भी की। झांसी के कारीगर गोला-बारूद तथा युद्ध की अन्य सामग्री बनाने में व्यस्त रहते। झांसी की जनता ने तोपों के काम में भरपूर सहयोग दिया। बंदूकें भरने का काम किया और तलवारों की धारें तेज कीं। वहां की स्त्रियों ने भी पूरा सहयोग दिया-गोला-बारूद पहुंचाईं, तोपों की कुरसियां बनाईं और समय पर रसद भी पहुंचाई। स्वयं ह्यू रोज ने अपनी आंखों देखा बयान किया है-“स्त्रियां तोपखाने में गोला-बारूद पहुंचाने आदि 1857 का स्वातंत्र्य समर – 361


160 1. मैलसन कृत-'इंडियन म्युटिनी', खंड 5, पृष्ठ 110 ।