१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकामों में व्यस्त दिखाई दीं।‘‘ इस प्रकार रात को नगर भर में युद्ध के नगाड़े बजने लगे और किले के बीच में मशालें जलती दिखाई दीं। पहरेदारों ने पूरी चौकसी बरती। 24 का सेवरा हुआ। अब क्या देर थी। ‘घन-गर्ज’ तोप ने अपना काम शुरू किया। उसकी गर्जना बड़ी भयंकर थी। झांसी के घेरे का आंखों देखा वर्णन दत्तात्रेय पारसनी कृत ‘रानी लक्ष्मीबाई का जीवनचरित’, पृष्ठ 187-193 के आधार पर इस प्रकार है- “25 तारीख से दोनों ओर से बराबर मुठभेड़ शुरू हुई। अंग्रेजी तोपें दिन-रात आग बरसा रही थीं। रात को किले के अंदर और शहर में गोले गिरने लगे। बड़ा भयंकर दृश्य था। पचास-साठ पौंड का गोला टेनिस की गेंद की तरह, किंतु अंगार-सा दीख पड़ता था। दिन की धूप में ये अस्पष्ट दीखते थे, पर रात में खूब चमकते और रात को भयंकर बना देते थे। 26 तारीख की दोपहर को दक्षिणी द्वार की अपनी तोपें अंग्रेजों ने निकम्मी कर दी थी। एक भी व्यक्ति वहां नही टिक पाता था। सब धैर्य खो बैठे थे। तब पश्चिमी द्वार के तोपची ने अपनी तोप का मुंह घुमाया और अंग्रेजों पर गोले फेंकने लगा। तीसरे गोले से अंग्रेजों का कुशल तोपची मारा गया और तोप भी बेकार हो गई। इससे रानी ने प्रसन्न होकर तोपची को चांदी का कड़ा इनाम में दिया। उस बहादुर तोपची का नाम था-गुलाम गोश खान। नत्थे खां के साथ हुए युद्ध में भी उसने ऐसा ही काम किया था। “पांचवे-छठ दिन उसी तरह युद्ध हुआ। चार-पांच घंटों तक रानी की तोपों ने अच्छा काम किया, अतः अंग्रेजों की तोपों की भीषण मार से रानी की तोपें बंद निकम्मी हुई। कोई वहां खड़ा नहीं हो सकता था। अंग्रेजों के गोलों में मुंडेर ढह पड़ी। किंतु रात मे ही कंबलों में छिपाकर ग्यारह राज वहां लाए गए और सुबह होने से पहले मुंडेर का काम पूरा हो गया। अंग्रेज इस व्यवस्था को देखकर दांतों तले अंगुली दबा गए। रानी की तोप ठीक काम कर रही है, इस बात से अंग्रेज बेखबर थे। उनको बहुत हानि उठानी पड़ी। उनकी तोपें लंबे अरसे तक बेकार रहीं। “आठवें दिन सवेरे ही अंग्रेजों ने शंकर किले पर हमला किया। अंग्रेजों के पास आधुनिक दूरबीनें थीं। इनकी मदद से किले के जलाशय पर तोपों से आग बरसाने लगे। पानी लाने के लिए नियुक्त छह-सात कहारों में से चार मारे गए। शेष बरतन वहीं फेंक भाग गए। चार घंटे तक पानी न मिलने से बड़ा कष्ट हुआ। अब पश्चिमी तथा दक्षिणी द्वारों पर से गोलाबारी करके अंग्रेजी तोपों को बेकार कर दिया गया। उन तोपों के बेकार होने से ही पीने और नहाने का पानी मिल पाया। इमली कुंज में बारूद का कारखाना था। दो मन बारूद तैयार होते ही तहखाने में भेज दी जाती। उस कारखाने का तोप का 1857 का स्वातंत्र्य समर - 362