भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 358, कुल 418 में से

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गोला पड़ा, तीस आदमी और आठ औरतें वहीं समाप्त हो गए। उस दनि घमासान लड़ाई हुई। तोपों और बंदूकों की कर्णभेदी आवाज कायरों के दिलों को फोड़े डाल रही थीं। तुरहियां और करताल जोरों से बज रहे थे। धूल और धुएं ने आकाश ढक लिया था। बुर्जों के कई तोपची तथा सैनिक मारे गए। उनके स्थान पर नए आ गए। रानी स्वयं भाग-दौड़कर बहुत कार्य कर रही थीं। हर छोटी-बड़ी बात पर रानी का ध्यान था। तुरंत आज्ञा होती। झट से कच्चे स्थान की मरम्मत हो जाती। रानी के इस व्यवहार से सैनिकों का हौंसला बढ़ता और वे जी-जान से लड़ते। इस कठोर प्रतिकार से अंग्रेज पर्याप्त शक्ति होने पर भी 31 मार्च (सन् 1858) तक किले में प्रवेश नहीं कर पाए।'' पग-पग पर संकटों का सामना था। युद्धकार्य में व्यस्त रानी लक्ष्मीबाई बड़ी उत्सुकता से एक दिशा की ओर उन्मुख होकर देख रही हैं। क्यों? रानी के होंठों पर मुस्कुराहट बिखर गई। मुस्कान मुद्रा के साथ आदेश हुआ। मान वंदना में तोपें दागो। गंभीर गर्जन की आवाज में विजय के ढोल बजने लगे। रणोल्लास से आकाश गूंज उठा। बात यह थी कि झांसी की सहायता के लिए तात्या टोपे सेना लेकर आ रहा है। तात्या टोपे विंडहम और कानपुर को पराजित कर तथा कैंपबेल से पराजित होकर, गंगा पार कर नाना साहब की छावनी में पहुंच गया। यहां से आगे चलकर कालपी के निकट यमुना को पार किया। अतः उस देशद्रोही चरखारी नरेश पर आक्रमण कर दिया। तात्या ने उसे हराकर उससे जुर्माना वसूल किया, चौबीस तोपें छीन लीं। फिर वह कालपी की ओर मुड़ा। वहां उसे लक्ष्मीबाई का पत्र मिला, जिसमें झांसी पर पड़े अंग्रेजों के घेरे को तोड़ने की प्रार्थना थी। तात्या ने झांसी के प्रधानमंत्री रावसाहब को पत्र भेजा और उनकी आज्ञा पाते ही अंग्रेजों की पिछाड़ी पर टूट पड़ा। इसी सहयोग से रानी के होंठों पर मुस्कुराहट दौड़ गई। बचपन में तात्या और लक्ष्मीबाई ब्रह्मवर्त के राजमहल में साथ-साथ खेला करते थे। और आज भी वे सजग होकर खेल रहे हैं-युद्धभूमि में। रानी झांसी की घेराबंदी में आग की लपटों में खड़ी हैं और तात्या बाईस हजार की सेना के साथ बेतवा के पास खड़ा है। बचपन के उनके खेल पर कौन ध्यान देता था। आज सारा विश्व उनके इस रण-खेल को देख रहा है। इतनी बड़ी सेना को लेकर तात्या को आते देख अंग्रेज घबरा गए। उस समय थोड़े सैनिक होने से उन्हें बड़ा धोखा था, क्योंकि समाने से लक्ष्मीबाई सामना कर रही थी और पीछे से तात्या पिछाड़ी दाब रहा था। तात्या शेर अपने बाईस हजार पंजों से अंग्रेजों पर टूट पड़ रहा था। जैसे ह ीवह शेर झपटने को था कि उसके बाईस हजार पंजे लुंज-पुंज हो गए। बिना पंजों के शेर क्या करता? उसके सैनिकों ने बेतवा के किनारे कायरता का बड़ा लज्जास्पद प्रदर्शन किया। रानी का सामने से और तात्या का पीछे से 1857 का स्वातंत्र्य समर - 363

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