भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 359, कुल 418 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 359

अंग्रेजों को घेरना सचमुच सराहनीय कार्य था। अंग्रेजों को निराशा हो रही थी, फिर भी अंग्रेजों ने तात्या पर हमला किया, झांसी पर तोपों से आग बरसाई और इस प्रकार क्रांतिकारियों के दोनों मोर्चों को अंग्रेजों ने ठंडा कर दिया। शिवाजी या कुंवर सिंह के रणधीर योद्धाओं की तरह हमला होता तो यह निश्चय था कि यूनियन जैक तथा उसके अनुयायियों की लाशों पर गिद्धों को दावत मिलती। पर हाय री कायरता! कायर सैनिक आगे बढ़ने से हिचकिचाए। तोपों से एक गोला भी न चला। सेना और सेनापति बुरी तरह डरकर भाग गए। इस गड़बड़ से बहुत सी युद्ध सामग्री अंग्रेजों के हाथ लगी। तात्या की सभी तोपें रखी गईं और पंद्रह सौ सैनिक मारे गए-भागते हुए एक हजार पांच सौ मरे। भागते हुए कायरों की मौत मरने की अपेक्षा हिम्मत से सामना करते हुए मरते तो उसकी सेना का सफाया निश्चित था और सच्ची वीरगति पाकर हुतात्मा बनकर यश के भागी बनते। फिर भी, हम तुम पर यों तरस खाते हैं कि कैसे ही सही, तुम लोग स्वतंत्रता के लिए ही मारे गए हो। परमात्मा तुम्हें क्षमा करे। वीर तात्या के कायर सैनिकों! तुम्हारी मृत्यु से देशवासियों को इतना पाठ अवश्य मिलेगा कि जो जीने के लिए भागते हैं, वे मारे जाते हैं और जो मरने के लिए रणक्षेत्र में जूझते हैं, वे जीवित रहते हैं, अमर हो जाते हैं। रानी लक्ष्मीबाई मृत्यु को चुनौती देती हुई जूझ रही थीं। पर सरदारों, ठाकुरों और सिपाहियों ने एकाएक लाचारी दिखाई। नौ दिन और नौ रातें आग बरसाती हुई तोपों के सामने ये लोग खड़े रहे। इन्हें आशा थी कि तात्या तोपें की दैवी सहायता अचानक ही मिलेगी और ज बवह आया तो इन्होंने आनंद के नारे लगाए। 1 अप्रैल को तात्या की हार हुई, तब उनका आनंद ही नहीं, विजय की आशा ही मिट गई। जिस रसद को विश्वासघाती शत्रु के हाथ से हजारों सैनिकों का बलिदान देकर छीना था, वह अब अनायास ही गोरों के हाथ लग गई। तात्या की तोपें तथा गोला-बारूद अंग्रेजों के हाथ लगे। फिर भी निराशा क्यों? विजयी होकर शत्रु न जीने दे तो भी मृत्यु के बाद की अमर कीर्ति को वह तुमसे नहीं छीन सकता। हे वीरों! दृढ़ निश्चय करके वीरता की मूर्ति रानी के मुख से उसका स्वर सुनो- "अब तक झांसी पेशवा के बलबूते पर नहीं जूझ रही थी। आगे युद्ध जारी रखने के लिए भी उनके सहयोग की विशेष आवश्यकता नहीं है। अब तक तुमने आत्माभिमान साहस, दृढ़ता एवं वीरता का सराहनीय परिचय दिया है। अब भी तुम उसी तरह काम लो। और मैं तुमसे आग्रह करती हूं कि धैर्य और प्राणपण से लड़ो।" “हां, प्राणपण से लड़ो। मारू बजने दो। वीर गर्जन से आकाश गूंजने दो। बड़ी-बड़ी तोपों को धड़धड़ाने दो। 3 अप्रैल क प्रभात किरणें पृथ्वी पर आ चुकी हैं और अंग्रेजों का आखिरी हमला झांसी पर हो चुका है। चारों ओर से उनका दबाव बढ़ गया 1857 का स्वातंत्र्य समर - 364