भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 360, कुल 418 में से

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हैं। इसलिए अब डटकर प्राणपण से लडो। देखो, युद्ध की देवी ने कैसी तलवार संभाली है और वीरता की पराकाष्टा दिखाने के लिए शत्रु के हरावल को विचलित कर रही है! रानी बिजली की तरह घूम रही हैं। किसी को सोने के कड़े, किसी को पोशाक बांट रही हैं। किसी की पीठ ठोकती है तो किसी को अपनी मुस्कान से उत्साहित कर रही हैं। गुलाम गोश खां और कुंवर खुदाबख्श, तोपों से आग बरसाओ। शत्रु मुख्य द्वार तोड़ रहा है, किलाबंदी तोड़ रहा है, आठ जगह नसैनियां लगाई गई हैं। 'हर-हर महादेव' की गूंज के साथ किले से, बुर्जों से, हर घर से गोलियों की बौछार हुई। बाढ़ों का तांता बंध गया। तोपें लाल गोले उगल रही हैं। आवाजें आती हैं-फिरंगी को मारो'। यह देखो, क्या यह युद्ध देवता है या रणचंडी, काली माता स्वयं भीषण युद्ध कर रही हैं। लेफ्टिनेंट डिक और लेफ्टिनेंट माइकल जोहान सीढ़ियां चढ़ रहे हैं और अपने आदमियों को चढ़ने के लिए ललकार रहे हैं। तोपों का धड़ाका हुआ। साहसी अंग्रेज काल के गाल में चले गए। और कोई है उनके पीछे आनेवाला? लेफ्टिनेंट बोनस और लेफ्टिनेंट फॉक्स, तुम मरना चाहते हो? बड़ी कठिनाई से चढ़े हुए इन चार वीरों को गिरते देख नसैनियां भी कांपने लगीं। अंग्रेजों ने पीछे हटने का बिगुल बजाया । सेना पीछे भागी। हर सिपाही चट्टान की ओट लेकर छिपते हुए भागा। इस तरह प्रमुख द्वार पर डटकर प्रतिकार हुआ। उधर दक्षिण बुर्ज पर कोई कराह रहा है। मालूम पड़ता है, विश्वासघाती नीच ने मोरचा द्वार गंवाया होगा। यह सच है कि अंग्रेजों ने देशद्रोहियों के बल पर ही फतह पाई है और अंग्रेज बुर्ज पर चढ़कर फुरती से आगे बढ़ रहे हैं। उस दिन सबके मन में एकमात्र भाव था-'मारेंगे या मरेंगे।' अंग्रेजों ने शहर में मार-काट मचा दी। एक के पीछे एक मोरचे पर कब्जा करते गए। कत्ल, आगजनी और विध्वंस का बाजार गरम था। वे राजमहल तक पहुंचे। राजप्रासाद पर अधिकार कर हजारों रूपए लूटे गए। पहरेदारों को मार डाला गया। ईंट-से-ईंट बजा दी गई। आखिरकार झांसी अंग्रेजों के हाथों में चली गई। परकोटे पर खड़ी रानी ने एक बार झांसी पर दृष्टि डाली। दक्षिण दरवाजे पर हुए भीषण कांड का दृश्य उनकी आंखों में तैर गया। शत्रु के स्पर्श से उनकी झांसी अपवित्र हो गई। क्रोध से रानी पागल हो उठीं। आंखों से क्रोध की चिंगारियां छूट रही थीं। उन्होंने अपनी तलवार संभाली, हजार-पंद्रह सौ सैनिक साथ लिये और किले को चल पड़ीं। अपने बच्चे को छेड़नेवाले पर भी शेरनी इतनी फुरती से नहीं झपटती जितनी तेजी से वह दक्षिण द्वार पर तैनात अंग्रेजों पर झपटीं। तलवारों से तलवारें भिड़ गईं। दोनों दल थोड़ी देर के लिए एक-दूसरे में समा गए। खनाखन की मार बजी, बहुत से गोरे मारे गए। शेष शहर की ओर भागे और ओट में छिपकर शिकार खेलने लगे। फिरंगी के खून से उस महाकाली का क्रोध कुछ शांत हुआ। ध्यान में आया कि किले से इतनी 1857 का स्वातंत्र्य समर – 365

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