भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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दूर अकेली का लड़त्रना महामूर्खता थी। अब इस असाधारण साहिसिक वीरता की प्रतिध्वनि शहर के हर रास्ते से मिलेन लगी। हालांकि सारा शहर, राजप्रासाद अंग्रेजों की तलवारों ने खून से रंग दिया। उनमें से हर वीर ने अपनी शक्ति भर अधिक-से-अधिक गोरों का सामना किया। उनके मर-मिटने पर ही घुड़साल शत्रु के हाथ लगी। अंग्रेजों ने अब तक शहर को खंडहर बना डाला था। उनके सामने जो भी आता-भले पांच वर्ष का बालक हो या अस्सी साल का बूढ़ा-उनकी तलवार का शिकार हो जाता । नगर भर आग से जल उठा। घायलों, मरनेवालों की चीखों से आकाश गूंज उठा। किले का परकोटा बहुत पक्का होने के कारण अंग्रेजों ने उसे तोड़ने का विचार दूसरे दिन का रखा। रानी परकोटे पर खड़ी करूणापूर्ण दृश्य को देख रही थीं। उन्हें अत्यंत दुःख हुआ। उनकी आंखे डबडबा आईं। रानी लक्ष्मीबाई रोईं। उनकी सुंदर आंखें रोने से लाल हो गई। उसकी झांसी की यह दशा! एक बार फिर सिर ऊंचा करके देखा, झांसी की किलाबंदी पर पराधीनता का दाग, फिरंगी का झंडा गाड़ा गया है। उन रोनेवाली आंखों में एक विलक्षण तेज चमक उठा। धन्य हैं वे आंखें, वह हृदय और वह धैर्य! इतने में बेतहाशा दौड़ता हुआ एक दूत आया और कहने लगा, "रानी सरकार! किले के प्रमुख द्वार-रक्षक सरदार कुंवर सिंह, दोनों तोपचियों खुदाबख्श और गुलाम गोश खां को अंगेजों ने गोली से उड़ा दिया है।" पहले से ही दुःखी हृदय पर यह कितना भयंकर आघात! संकट-पर-संकट आ रहे हैं। रानी का अब एक ही निश्चय है-स्वाधीनता की कौस्तुभ मणि झांसी की लक्ष्मी के गले से नहीं गिरनी चाहिए। उस दूत से, जो एक बूढ़ा सरदार था, रानी न कहा, "देखो, मैं इस किले में अपने हाथों बारूद के भंडार में आग लगाकर बाहर निकल जाना चाहती हूं।" अपने जरीपट के साथ स्वाधीनता के झंडे को लिये हुए या तो वह राजसिंहासन पर विराजमान होंगी या फिर चिता पर। यह सुनकर उस बूढ़े सरदार ने शांति से कहा, "सरदार, यहां रहना अब खतरनाक है। शत्रु की छावनी को चीरकर आपको आज रात किला छोड़कर चले जाना चाहिए और पेशवा की सेना में पहुंचना चाहिए। और यदि मार्ग में ही मृत्यु मिल जाए तो समरांगण-तीर्थ की पवित्र धारा में गोता लगाकर स्वर्ग द्वार में प्रवेश हो सकता है।" "मैं मैदान में लड़ते-लड़ते मरना अधिक पसंद करती हूं।" रानी का जवाब था, "किंतु मैं स्त्री हूं। मेरे शरीर की कहीं विडंबना हुई तो?" यह सुनकर सब सरदारों ने एक स्वर से कहा, "जब तक हममें से एक भी जीवित है तब तक आपके शरीर को छूनेवाले के टुकड़े-टुकड़े कर दिए जाएंगे।" रात हुई। रानी ने अपनी प्रजा को बुलाकर अंतिम बार आर्शीवाद दिया। रानी 1857 का स्वातंत्र्य समर - 366