१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंका झांसी छोड़ने का इरादा देख प्रजा की आंखें गीली हो गईं, शायद फिर न लौटें। रानी ने चुनिंदा घुड़सवारों को अपने साथ लिया। आभूषणों से सजाया हुआ एक हाथी उनके बीच रखा गया। 'हर-हर-महादेव' के घोष के साथ वे किले से उतरने लगीं। पुरुष वेश बनाया था। फौलादी कवच ने शरीर की रक्षा की थी। कमरबंद में एक जमिया पड़ा था और एक पैनी तलवार लटक रही थी। अंचल में एक प्याला बंधा था, रेशमी धोती से पीठ पर उनका दत्तक पुत्र दामोदर बंधा हुआ था। सफेद घोड़े पर सवार रानी साक्षात् लक्ष्मी लगती थीं। उत्तरी दरवाजे के निकट पहुंचने पर देशद्रोही टिहरी नरेश के पहरेदार ने टोका, "कौन है?'' "टिहरी की सेना सर ह्यू रोज की सहायता के लिए कूच कर रही है।'' उत्तर मिला और प्रहरी ने जाने दिया। रानी आगे बढ़ीं। एक गोरे प्रहरी को भी इसी तरह टाला गया। रानी के अंगरक्षकों में एक दासी, एक बारगीर और दस-पंद्रह घुड़सवार थे। इस तरह से यह सेना शत्रु की छावनी की बीच से कालपी तक सुरक्षित पहुंच गई। किंतु रानी के अन्य घुड़सवारों को संदेह में अंग्रेजों ने रोका और वहीं ठन गई। मोरोपंत तांबे घायल होने पर भी दतिया तक निकल गए; किंतु दतिया के देशद्रोही दीवान ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और अंग्रेजों को सौंप दिया। अंग्रेजों ने उन्हें फांसी के झूले पर झुला दिया। लक्ष्मी ने घोड़े को एड लगाई, क्योंकि लेफ्टिनेंट बॉकर चुने हुए घुड़सवारों के साथ रानी को पकड़ने के लिए पीछा करता हुआ आ रहा है। हे रानी के अश्व! तुम्हारी पीठ पर जो पवित्र निधि है उसकी रक्षा के लिए पूरा बल लगाकर दौड़ो। देश के मानव भले ही देशद्रोही बनें, पर देश के पशु तुम तो ईमानदार ही रहोगे। तुम्हारे पशुत्व के आगे देशद्रोहियों के मनुष्यत्व पर हजार बार लानत है। और हे रजनी! तुम भी रानी और घुड़सवारों को छिपाने के लिए अपनी काली चादर फैला दो! और हे भारत के मार्ग! तुम उस घोड़े को कोई बाधा मत देना। और आकाश में चमकते तारागणों! शत्रु को प्रकाश मत दो। हां, इतना प्रकाश अवश्य दो कि कमल के समान कोमल रानी उत्साह के साथ अपने मार्ग पर अग्रसर हो सकें। अब उषा का आगमन हुआ है और वीर रानी, तुम वायु के पंखों पर रात भर उड़ी चली आ रही हो। सो अब मंडेर गांव के पास कुछ विश्राम लो। वहां का लंबरदार तुम्हारे प्यार दामोदर को खिलाएगा। सुबह का नाश्ता करके रानी तुरंत कालपी की ओर चल पड़ीं। लेकिन पीछे से गुबार उड़ रहे हैं। रानी, घोड़े को तेज करो, दामोदर को संभालो और आगे बढ़ो। अपनी तलवार संभालों। बॉकर नजदीक आ चुका है। 'तो नीच बॉकर, अपनी नीचता का पुरस्कार ले! तलवार उठी और बॉकर लड़खड़ाता हुआ घोड़े से गिर पड़ा। पीछा करनेवाले अंग्रेज और रानी के दस-पंद्रह घुड़सवारों में प्राणघातक मुठभेड़ हुई। उनमें से जो बचे वे लक्ष्मी की रक्षा के लिए आगे बढ़े। घायल बॉकर और उसके साथियों ने पीछा करने 1857 का स्वातंत्र्य समर – 367